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भारतीय कंपनी जगत में काम करने वालों के लिए अभी तक सही मायने में समान अवसर की अवधारणा को नहीं अपनाया है। कंपनियों के बीच कराए गए एक ताजा सर्वें के अनुसार 50 प्रतिशत कर्मचरियों ने कहा कि उनके साथा नियुक्ति और काम के दौरान भेद-भाव होता है।
टीम लीज की इस रपट में कहा गया है कि देश में कार्यस्थलों पर आम तौर पर सबका ध्यान रखने की नीति अपनाई जाती है, लेकिन अभी भी विभिन्न आधार पर, विशेष तौर पर नियुक्ति में भेद-भाव होता है। भारत के आठ प्रमुख शहरों - नई दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, बेंगलूर, हैदराबाद, चेन्नई, कोलकाता, बेंगलूरु, हैदराबाद, पुणे और अहमदाबाद - में किए गए इस सर्वेक्षण में पाया गया कि औसतन 10 में 5 कर्मचारियों के साथ किसी न किसी तरह का भेद-भाव होता है।
हालात निराशाजनक नहीं है क्योंकि जाति और धर्म के आधार पर भेद-भाव काफी कम हुआ है। रपट में कहा गया कि हालांकि योग्यता, उम्र और स्त्री-पुरुष के आधार पर सबसे अधिक भेद-भाव होता है। रपट के मुताबिक गर्भवती महिलाएं या छोटे बच्चों वाली महिलाओं को नियुक्ति प्रकिया और दफ्तर में अवसर दोनों ही स्थितियों में अपेक्षाकृत अधिक भेद-भाव झेलना पड़ता है।
टीम लीज सर्विसेज के वरिष्ठ उपाध्यक्ष सुरभि माथुर गांधी ने कहा कि समुदाय और जाति के आधार पर अब आम तौर पर भेद-भाव नहीं होता, लेकिन भारतीय उद्योग को भेद-भाव मुक्त काम करने का माहौल तैयार करने के लिए अभी बहुत कुछ करना है।
उन्होंने कहा यह भेद-भाव अभी हो रहा है जबकि कर्मचारियों विशेष तौर पर महिला कर्मचारियों की संख्या में वद्धि कम हो रही है। कंपनियों को भेद-भाव के खिलाफ प्रभावशाली नीति बनानी चाहिए अन्यथा उत्पादकता प्रभावित होगी।
रपट में एक मजेदार तथ्य यह है कि उम्र बढ़ने पर ज्यादा भेद-भाव नहीं झेलना पड़ता। सर्वे में 21 से 35 साल के 54 प्रतिशत कर्मचारियों ने भेदभाव की शिकायत की। दिल्ली में भेदभाव की शिकायतें अपेक्षाकत ऊंची पाई गईं।
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