NEWS WAR | नई दिल्ली

देश के राजनीतिक दल पारदर्शी होने को तैयार नहीं हैं। सत्ताधारी दल कांग्रेस और मुख्य विपक्ष भाजपा के साथ-साथ वामपंथी और अन्य क्षेत्रीय दलों ने खुद को आरटीआइ कानून केदायरे में लाने के केंद्रीय सूचना आयोग [सीआइसी] के फैसले को खारिज कर दिया है। किसी को इसमें लोकतंत्र के लिए खतरा दिख रहा है, तो किसी को इसके दुरुपयोग का भय सता रहा है। अपने कामकाज व संपत्ति का ब्योरा देने के इस फैसले के खिलाफ एकजुट हुए राजनीतिक दलों ने न सिर्फ तीखी प्रतिक्रिया दी, बल्कि सरकार ने अदालत जाने का विकल्प भी खुला रखा है।
आरटीआइ कानून पर अपनी पीठ ठोकने वाली कांग्रेस ने इस फैसले पर एक दिन तक चुप्पी साधने के बाद बेहद तीखी प्रतिक्रिया दी। कांग्रेस महासचिव व मीडिया विभाग के अध्यक्ष जनार्दन दिवेदी ने कहा, 'पार्टी सीआइसी के उस फैसले को अस्वीकार करती है जिसमें कहा गया है कि वह सूचना कानून के दायरे में आती है और उसे जनता को जवाब देना चाहिए।' वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने कहा कि सीआइसी का फैसला विश्वसनीय तर्को पर आधारित नहीं है। विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने भी कहा कि आरटीआइ पर व्यवहारिक नियंत्रण रखना होगा, ताकि कोई इसका मनमाना इस्तेमाल न कर सके।
इसका उद्देश्य सरकारी कर्मचारियों को जनता के प्रति जवाबदेह बनाना था। प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री वी. नारायणसामी ने कहा कि राजनीतिक दल सरकारी नहीं निजी संगठन हैं। ये आरटीआइ के दायरे में नहीं आते। अगर जरूरत पड़ती है तो सरकार के पास कोर्ट जाने का रास्ता खुला है।
कार्मिक विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि सूचना आयोग के आदेश का अध्ययन किया जा रहा है। इसके बाद ही कोई कार्रवाई की जाएगी।
मुख्य विपक्षी दल भाजपा पहले तो भ्रमित दिखी, लेकिन बाद में उसने भी कांग्रेस की भाषा ही बोली। पहले तो पार्टी प्रवक्ता कैप्टन अभिमन्यु ने शुचिता और पारदर्शिता का डंका पीटते हुए कह दिया कि भाजपा सूचना आयोग के आदेश का पालन करेगी। बाद में राज्यसभा में विपक्ष के नेता और वरिष्ठ कानूनविद् अरुण जेटली ने सीआइसी के फैसले को नकार दिया। भाजपा उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी फैसले को लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने वाला मानते हैं।
वामपंथी भी इस मसले पर कांग्रेस और भाजपा के साथ दिखे। माकपा महासचिव प्रकाश करात ने कहा कि हमारी विचारधारा से सहमत लोग ही पार्टी के सदस्य बनते हैं। पार्टी की जवाबदेही सिर्फ उसके सदस्यों के प्रति है। फैसले में राजनीतिक दलों, सरकार और सत्ता का घालमेल कर दिया गया है। हम अपनी पार्टी के तौर-तरीके के बारे में किसी दूसरे को जानकारी क्यों दें। जदयू ने भी फैसले को गलत बताया और इसके दुरुपयोग की आशंका जताई।
सिर्फ आम आदमी पार्टी ने फैसले का स्वागत किया है। पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने चुनौती दी है कि कांग्रेस और भाजपा 'आप' की तरह चंदे का ब्योरा वेबसाइट पर डालकर दिखाएं। राजनीतिक दलों को आरटीआइ के दायरे में लाने की याचिका दाखिल करने वाले एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्मस ने संतोष जताया कि उनकी मुहिम पूरी हो गई है।
पार्टियों की आपत्तियां
-सूचना आयोग का फैसला लोकतंत्र पर चोट है।
-विरोधी पार्टी के कामकाज की जानकारी ले लेंगे।
-पार्टियां किसी कानून पर गठित नहीं होतीं। इसलिए सार्वजनिक संस्थाएं नहीं कही जा सकतीं।
-राजनीतिक दल सिर्फ अपने सदस्यों के प्रति जवाबदेह।
-आरटीआइ कानून सरकारी दफ्तरों व संस्थाओं पर ही लागू होगा
No comments:
Post a Comment