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अभी पिछले सप्ताह की ही बात है। इस फिल्म के प्रोमोशन के दौरान अक्षय कुमार ने (फिल्म समीक्षकों के लिए) कहा, ‘मुझे वो क्रिटिक पसंद है, जो सिनेमाहाल में दर्शकों के बीच बैठकर, उनकी प्रतिक्रिया के अनुसार फिल्म रिव्यू करते हैं।’ अक्षय की इस बात को सहज ही समझा सकता है कि जब फलां फलां सीन पर दर्शक एन्जॉय कर रहे हैं तो क्रिटिक को उसमें खुरपेंच करने की क्या जरूरत है। बेशक, इस फिल्म में जब अक्षय कुमार की एंट्री होती है तो दर्शक हो हल्ला करते दिखते हैं। इंटरवल से पहले उनके संवादों पर तालियां भी पीटते हैं और सीटियां भी मारते हैं। लेकिन इंटरवल के बाद इन्हीं दर्शकों को मानो सांप सा सूंघ जाता है। क्लाईमैक्स के दौरान हलचल न के बराबर दिखती है। मतलब साफ है कि जो दर्शक फिल्म की शुरुआत पर प्रफुल्लित हो रहे थे, धीरे-धीरे शांत होते दिखते हैं क्योंकि उन्हें इस सुस्त प्रेम कहानी के अंत होने का इंतजार है।
वर्ष 2010 में आयी अजय देवगन और इमरान हाशमी की फिल्म वंस अपॉन ए टाइम इन मुंबई का सीक्वल वंस अपॉन ए टाइम इन मुंबई दोबारा को देख निराशा हाथ लगती है। पिछली और इस बार की फिल्म में केवल संवादों की समानता है। या कहिये इस बार संवादों का ओवरडोज हो गया है। संवादों को हैवीवेट बनाने के चक्कर में लेखक रजत अरोड़ा ने कहानी की तरफ ध्यान ही नहीं दिया है। फिल्म में दो और कमजोर कड़ियां है, जिनके जिक्र से पहले जरा एक नजर कहानी पर डाली जाए। सुल्तान की मौत के बाद अब शोएब (अक्षय कुमार) मुंबई पर राज कर रहा है। उसके माफिया की जड़े खाड़ी देशों पर फैली हैं। उसका नया प्यादा है असलम (इमरान खान), जिसके सिर पर उसने बचपन में हाथ रखा था। एक दिन असलम की जिंदगी में यास्मीन (सोनाक्षी सिन्हा) की एंट्री होती है, जो हीरोइन बनने आयी है और उसके इस सपने को साकार करता है शोएब। शोएब उसे मन ही मन चाहने लगता है। बस यहीं से असलम और शोएब के बीच तकरार हो जाती है। सबसे पहले बात करते हैं कहानी की। फिल्म में माफिया या फिर गैंगस्टर इलिमेंट न के बराबर है।
सुल्तान जैसे पावरफुल गैंगस्टर की मौत के बाद शोएब का आतंक या फिर उसके कामकाज को देखने में जो मजा है, वो उसकी प्रेम कहानी में कहां। प्रेम कहानी और वो भी एक तरफा, जिसे समझने और सुलझाने में ही पूरी पिक्चर निकल जाती है। यही नहीं, अत तक आते आते ये प्रेम कहानी बेहद सुस्त हो जाती है। फिल्म की कहानी में और भी कई छोटे-बड़े छेद हैं। मुमताज (सोनाली बेन्द्रे) का किरदार क्यों है, ये समझ से परे है। बड़ा गैंगस्टर बनने के बाद मुमताज उसकी एक रखैल बनकर रह जाती है, जिससे वह अपनी नई प्रेमिका का जिक्र भी बेहद बेतकल्लुफी से करता है। अक्षय कुमार फिल्म के कई हिस्सों में जंचे हैं। उनका स्टाइल अच्छा है, लेकिन उनकी आवाज उनके फ्लेवर की फिल्मों के साथ फिट बैठती है। इस किरदार में उतने फिट नहीं लगे, जितनी उम्मीद की जा रही थी। बावजूद इसके इस फिल्म में अगर कहीं भी थोड़ी बहुत उम्मीद दिखती है तो उन्हीं के किरदार में दिखती है। फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी रहे इमरान खान।
करीब पौने तीन घंटे की इस फिल्म में संभवत: अक्षय के बराबर की उनके सीन हैं। अंदाजा लगा सकते हैं कि एक चिकने प्यादे को शोएब जैसे गैंगस्टर के सामने खड़े होने में कितने पापड़ बेलने पड़े होंगे। उधर, सोनाक्षी सिन्हा कहीं भी कोई स्पेस नहीं बना सकीं। फिल्म में संगीत पक्ष ठीकठाक है। हालांकि पहले वाली फिल्म के मुकाबले कमजोर है। छुट्टियों का माहौल है और जो अक्षय के फैन हैं उनके लिए ही ये फिल्म एक ट्रीट हो सकती है। वर्ना तो..
सितारे: अक्षय कुमार, सोनाक्षी सिन्हा, इमरान खान, सोनाली बेन्द्रे, महेश मांजरेकर, अभिमन्यु सिंह, पितोबश त्रिपाठी, मुश्ताक खान, सरफराज खान
निर्देशक: मिलन लूथरिया
निर्माता: एकता कपूर, शोभा कपूर
बैनर: बालाजी मोशन पिक्चर्स
संगीत: प्रितम चक्रवर्ती, अनुपम अमोद
कहानी, गीत, संवाद: रजत अरो
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