Thursday, 8 August 2013

फिल्म रिव्यू: फुकरे


MANISH DUBEY | NEWS WAR MEDIA PVT LTD - अब दिल्लीवालों को तो कम से कम फुकरे का मतलब समझाने की जरूरत नहीं होनी चाहिये। खासतौर से अगर पश्चिमी दिल्ली की तरफ निकल जाएं तो ये शब्द आम सुनाई पड़ता है। लेकिन ये कहानी तो जमुनापार की है, जो शुरू होती है झिलमिल कॉलोनी के उस बस स्टैंड से जहां से पहला फुकरा यानी लाली (मनजोत सिंह) अपनी एकतरफा गर्लफ्रेंड को बाइक पर कॉलेज छोड़ने की कारसेवा करता है। इसी कॉलेज में अपना दूसरा फुकरा है यानी जफर (अली फजल) भाई, जो बनना चाहता है बड़ा गायक, लेकिन कुछ गायब सा रहता है। बाकी के दो फुकरे हैं हन्नी (पुलकित सम्राट) और उसका पठ्ठा चूचा (वरुण शर्मा)। बॉस, चूचे का नाम सुनकर हंसना मना है। उसे बुरा लग जाता है। हां तो ये हन्नी और चूचा ही इस पूरी फुकरापंती की जड़ हैं। मामले में असली फुकरापन तब सामने आता है, जब हन्नी और चूचा को एडमिशन के लिए पैसों का जुगाड़ करना पड़ता है। इन दोनों को पैसे चाहिये पर्चा लीक कराने के लिए। पर्चा लीक का आइडिया दिया है पंडित जी (पंकज त्रिपाठी) ने, जो उस कॉलेज का चौकीदार कम मैनेजर है। यही वो कॉलेज है, जिसमें जफर पढ़ता है और जिसके सपने लेते हैं हन्नी और चूचा। यही कॉलेज लाली के सपनों की भी मंजिल है। जब सारे फुकरों की मंजिल वो एक कॉलेज ही है तो क्यों न भरत मिलाप भी हो जाए। इसका प्रबंध भी पंडित जी ने कर डाला है। फुकरों की पैसों की समस्या के समाधान के लिए पंडित उन्हें एक लेडी दबंग यानी भोली पंजाबन (रिचा चड्ढा) के पास ले जाता है, जो उनसे एक डील कर 4-5 लाख रुपये दे देती है। यहां सामने आता है इन फुकरों का असली जुगाड़। दरअसल, चूचा रोज एक सपना देखता है, जिसमें होती है एक पहेली। उस पहेली को सुलझाता है हन्नी, जिसके बाद इन दोनों के हाथ लगता है एक नंबर। और वो होता है लॉटरी का नंबर, जो सौ फीसदी लगता है। भोली से मिले पैसों से इन्हें उसी नंबर पर लगाना है। लेकिन हाय री किस्मत। खुशी के मारे उस रात चूचा सोता ही नहीं है और एक नकली सपना हन्नी को सुना देता है। हन्नी भी नकली सपने के आगे एक नकली नंबर पर पैसा लगा देता है। आगे क्या होता है, इस पर दिमाग लगाना बेकार है, क्योंकि आगे वो होता है, जो अब से पहले फिल्मों में कभी नहीं हुआ। लगता है कि बतौर निर्माता फरहान अख्तर चार दोस्तों की कहानियों पर कोई पीएचडी करने वाले हैं। दिल चाहता है, जिंदगी मिलेगी न दोबारा के बाद अब फुकरे। फुकरे को आप किसी भी एंगल से देखें, आपको फन के सिवाए कुछ नहीं मिलेगा। निर्देशक मृगदीप सिंह लांबा और विजय विग ने इस फिल्म के एक-एक सीन को इतनी खूबसूरती से फिल्माया और लिखा है कि आप सीट छोड़ने का नाम नहीं लेंगे। जो बात आपको उपरोक्त दो फिल्मों में पसंद आयी, वो इसमें भी है। जो बात आपको दिल्ली बेस्ड फिल्म खोसला का घोंसला, विक्की डोनर, बैंड बाजा बारात और दो दूनी चार जैसी फिल्मों में पसंद आयी, वो इसमें भी है। जी हैं, और वो है लेखन। दिल्ली के अपने देसी अंदाज में सजा और बुना लेखन। भोली पंजाबन का चांदनी चौक स्टाइल में लेडी लड़ाका किरदार। सच कहें तो चूचा जैसा किरदार आपको ढूंढ़ने ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ेगा। लड़कों के तकरीबन हर गैंग में एक ऐसा नमूना जरूर होता है। हन्नी और चूचा की नीली कमीज और खाकी पैंट, सरकारी स्कूल की वर्दी में वो सच्चाई दिखाई गयी है, जिसे परदे पर कम छुआ गया है। लाली की बाइक का सामान चुराने वाले एक नशेड़ी का किरदार क्या इतना दिलचस्प भी हो सकता है। हन्नी का छतें फांदकर अपनी गर्लफ्रेंड से मिलने जाना, उससे गली में इशारों से बातें करना, हन्नी-चूचा का साइकिल पर कॉलेज के चक्कर लगाना, लाली के डैडीजी का गुस्सा और जफर का अपने पिता के लिए पछतावा आपको एक अलग तरह का सुकून देता है। स्कूल-कॉलेज में पढ़ने वाले लड़कों की तरह दिखने वाले ये फिल्म के चारों किरदार आपको अपने आस-पास के ही लगेंगे। फिर याद आएगी आपको अपने आस-पास के ही किसी फुकरे की या फिर अपने पुराने दिनों की, जब कहीं न कहीं कभी न कभी हम सभी फुकरे ही तो हुआ करते थे। बॉस, इन फुकरों के लिए जरूर सिनेमाघरों का रुख करें। मस्ट वाच। सितारे: पुलकित सम्राट, मनजोत सिंह, अली फजल, वरुण शर्मा, प्रिया आनंद, विशाखा सिंह, रिचा चड्ढा, पंकज त्रिपाठी निर्देशक: मृगदीप सिंह लांबा निर्माता: फरहान अख्तर, रितेश सिधवानी बैनर: एक्सेल एंटरटेनमेंट संगीत: राम संपत कहानी, पटकथा, संवाद: मृगदीप सिंह लांबा, विपुल विग

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