Sunday, 26 May 2019

जाने क्यों हार गए भाजपा के मनोज सिन्हा


गाजीपुरियों की मासूमियत के क्या कहने मनोज सिन्हा की हार से गाजीपुर स्तब्ध है। यह अनायास नहीं है। बनारस के आगे ग़ाज़ीपुर के शायद ही कुछ स्टेशन हो जिसपर बुनियादी सुविधाओं का विस्तार श्री सिन्हा द्वारा नहीं करवाया गया हो। उनके काम से केवल गाजीपुर नहीं बल्कि बलिया, मऊ, जौनपुर जैसे जिले भी लाभान्वित हुए है। रेलवे लाइन का दोहरीकरण, औड़िहार में कारखाना, गाजीपुर, बनारस, इलाहाबाद,जौनपुर, बलिया डीईएमयू गाड़ियों का संचालन, वाईफ़ाई जैसी कई अविश्वसनीय सुविधाएं क्षेत्र को मिली। सिन्हा जी ने रेलवे की अभूतपूर्व सुविधाओं से जिले को सम्पन्न करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा। राजकीय मेडिकल कालेज, स्पोर्ट्स कम्प्लेक्स जैसी कई सौगातें भी उनकी वजह से मिली। विकास पुरूष का तमगा उनको ऐसे नहीं मिला है बल्कि उन्होंने काम किया है, तभी तो उनको वोट नहीं देने वाले भी उनकी हार पर अफ़सोस जता रहे, जो यह कहते थे कि कमल पर वोट देते उनके हाथ काँपते है वह उनके राज्यसभा से मनोनीत होकर फिर से मंत्री बनने की कल्पना कर रहे हैं। गाजीपुरियों की यह मासूमियत भी खूब है। डीईएमयू में सवारी करने वालों को सिन्हा जी पर गर्व तो है लेकिन जातिगत समीकरण से उनके हाथ बंधे है। यह एकतरफ़ा नहीं है। सिन्हा जी भी खुद्दारी से कहते थे, पिछले सांसदो का औऱ मेरा काम मिला लीजिएगा। काम अच्छा लगे तो वोट दीजिएगा। राजनीति में इतनी साफ़गोई कम ही दिखती है। खासकर पूर्वांचल की परिस्थितियों में। यहां चुनाव परिणाम जातिगत औऱ सामाजिक समीकरण के आधार पर तय होते हैं। ऐसे में इस हार-जीत को विकास वर्सेज गुंडाराज के चश्मे से देखना सटीक आकलन नहीं हो सकता है। अखबारों के अनुसार मनोज सिन्हा भाजपा के शीर्ष नेता है जिनका वोट पूरे उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 1.36 लाख बढ़ा है। 2014 के लोकसभा चुनाव में उनकों मात्र 3 लाख 6 हजार वोट मिला था जो इस चुनाव में बढ़कर 4 लाख 46 हजार पहुंच गया। इसके बावजूद भी हुई हार के निहितार्थ गहरे है। जनपद के लिए इतना कुछ करने के बाद भी मनोज सिन्हा अपने ऊपर लगे अगड़ों के नेता होने के ठप्पे को नहीं हटा पाए है। उनकी उपलब्धियों से पिछड़े औऱ दलित अप्रभावित ही रहे। यह पराजय अगड़ों औऱ पिछड़ों में चलने वाले कालर वॉर का परिणाम है, जो हसुवां केतनों टेढ़ा हो लेकिन अपनी तरफ़ ही खीचता की तर्ज़ पर काम करती है। यह मेरा अपना आकलन है इससे हर कोई इतेफाक रखें जरूरी नहीं। नीलाभ राय की फेसबुक वॉल से साभार

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