Tuesday, 11 June 2019

पढ़े एक सिक्योरिटी गार्ड की दास्तान


पांच दिन पहले मैंने अपनी सोसाइटी में नाइट ड्यूटी पर तैनात एक गार्ड की दास्तान लिखी थी। पोस्ट थोड़ी अधूरी थी, अब नई जानकारियों के साथ फिर से लिख रहा हूं। एक रोज रात करीब 11 बजे सोसाइटी में रहने वाली एक मैडम जी नीचे आई थीं, उससे पूछा था कि खाना कहां मिलेगा। गार्ड ने उनको बताया कि अभी तो आसपास के रेस्टोरेंट बंद हो चुके होंगे। केडीपी सवाना के पास पराठों का पता बताया तो मैडम बोलीं-फुटपाथ का नहीं खाऊंगी। उसने फिर सोसाइटी में ही एक फ्लैट का पता दिया, बताया कि वहां से टिफिन सप्लाई होता है। वहां फोन किया तो पता चला कि खाना खत्म हो गया। आखिरकार गार्ड ने उनसे कहा-मैडम जी आप मेरा टिफिन ले लीजिए। अभी थोड़ी ही देर पहले ही ड्यूटी पर आया हूं। घर का बना खाना है, ताजा भी है। इसके बाद मैडम हत्थे से उखड़ गईं। उसे डांट पिलाई कि उसकी हिम्मत कैसे हुई अपना खाना ऑफर करने की। मैडम ने उसे जी भरकर डांटा, फिर नौकरी से निकलवाने की धमकी भी दी। डरे-सहमे गार्ड ने माफी मांगी, तो मामला शांत हुआ। संयोग की बात ये थी कि उस वक्त वहां कोई नहीं था। हालांकि मैंने पिछली पोस्ट में लिखा था कि वहां मेरा बेटा समन्वय मौजूद था। ये गार्ड लखनऊ का रहने वाला है। मेरे बेटे समन्वय की आदत है कि सोसाइटी के गार्ड से वो हालचाल जरूर पूछते हैं, काम भर का रिश्ता भी बना लेते हैं। वक्त जरूरत ठंडा पानी भी पहुंचाते हैं। इस गार्ड से भी समन्वय की खूब बातचीत होती थी। तो गार्ड ने ये दास्तान समन्वय को बताई थी। समन्वय भावुक हुए, गार्ड को गले लगाया। फिर ये बात अपने बड़े भाई, यानी मेरे भतीजे वीरू को बताई। वीरू ने जब तक मुझे बताया, तब तक समन्वय मुंबई जा चुके थे, इस नाते तथ्यों में थोड़ी हेर फेर हो गई। खैर फेसबुक पर गार्ड की दास्तान पोस्ट करने की अगली रात मैं उससे मिला। 23-24 साल का प्यारा सा इंसान। उसने मुझे उस रात की पूरी दास्तान सुनाई। बोला कि उस पूरी रात वो डरा भी था और शर्मसार भी था। मन में यही ख्याल आ रहा था कि क्या मैं इतना छोटा काम करता हूं कि किसी को खाना भी नहीं पूछ सकता..? उसने बताया कि वो जाति से राजपूत है। पारिवारिक मजबूरी की वजह से बीए पार्ट-3 तक पहुंचने के बाद पढ़ाई छूट गई। रोजगार की खोज में लखनऊ से दिल्ली आ गया। सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी मिल गई। उसने मुझसे पूछा-सर गार्ड की नौकरी इतनी गिरी हुई है क्या, मेहनत से कमाता हूं, 12 घंटे ड्यूटी करता हूं, लेकिन कोई इज्जत नहीं है। मैंने उसे समझाया कि तुम्हारी नौकरी हम सबसे बड़ी है। तुम हम सबकी रक्षा करते हो। ऊपर भगवान और नीचे तुम हो हमारे रखवाले। उस रात जो हुआ उसे भूल जाओ। मैंने उसे गले लगाया, उसके साथ सेल्फी ली। कहा कि जब भी कोई जरूरत हो, कोई बात हो, कोई परेशानी हो, सीधे मेरे फ्लैट में आ जाना। मैंने उससे बताया कि फेसबुक पर उसकी कहानी लिखी है। उसने पूछा-सर फोटो भी पोस्ट करोगे क्या, मैंने कहा- हां सोचा तो है। वो बोला- सर रहने दीजिएगा। गांव वालों और रिश्तेदारों को नहीं मालूम कि मैं सिक्योरिटी गार्ड हूं, ऐसे में फोटो अगर उनकी नजर में पड़ गई तो घर वालों की बदनामी होगी। मैं उससे कैसे समझाता कि वो बदनामी वाली नौकरी नहीं करता, क्योंकि पहले ही उस मैडम ने बेड़ा गर्क कर दिया था। ये दास्तान सुखांत ही रही। गार्ड की शिकायत कहीं और नहीं पहुंची, पहुंचती तो भी शायद ही कोई महामूर्ख उस पर एक्शन लेता। बस अफसोस तो ये है कि घमंड में चूर उन तंगदिल मैडम को कोई सबक नहीं मिला। गार्ड की बात चली है तो बड़ी ही विनम्रता से कुछ कहना चाहता हूं। बेटे के स्कूली दिनों में हमने उसके जन्मदिन पर हमेशा उसके स्कूल के गार्ड्स और कर्मचारियों को लड्डू खिलवाए। जब राजेंद्र नगर के शुभधाम अपार्टमेंट में रहता था, महीने-दो महीने में एक बार सभी गार्ड्स को लजीज भोजन मेरा परिवार करवाता रहा। रात में कहीं से घूमकर आए तो गेट और पीछे की तरफ तैनात सभी गार्ड्स के लिए आइसक्रीम जरूर लेकर आए। शायद यही वजह थी कि एक-एक गार्ड, मेरे परिवार के एक-एक सदस्य को पहचानता था, दिल से सम्मान देता था। मेरी गाड़ी दूर से ही आती दिखती तो होड़ लग जाती कि मेन गेट कौन खोलेगा। इस कहानी के अंत में बस यही कहना चाहता हूं कि इंसान की पहचान का एक बड़ा फार्मूला जान लीजिए। उसकी पहचान उसकी अमीरी, पहनावे और शानो शौकत से मत कीजिए। बस ये देखिए कि वो अपने से छोटों, अपने अधीनस्थों, अपने नौकरों के साथ कैसा व्यवहार करता है? अगर आपका कोई साथी इनसे गलत व्यवहार करता दिखे, तो यकीन कर लीजिए कि आपने गलत इंसान का साथ कर रखा है। आज तक चैनल में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार विकाश मिश्रा की फेसबुक वॉल से साभार

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