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लॉकडाउन सीजन 3 चालू होने वाला है। जिसको अभी दो दिन और बचे हैं। सरकार मदद कर रही है, नहीं कर रही इसकी जमीनी हकीकत क्या है? जमीन वाले ही जाने। हर वर्ग, ज्यादातर तबका लाभान्वित हो रहा है ऐसा कहा दिखाया जा रहा है। तो अभिवावक वर्ग अलग परेशान है। जिसके चलते कानपुर के एक अभिवावक ने सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नाम खून से एक पेज भर चिट्ठी लिख दी।
अपने खून से लिखे खत में 'लॉकडाउन में सरकारी व प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की 3 माह की फीस माफी' का विषय डालते हुए कानपुर के विनय वर्मा मुख्यमंत्री आदित्यनाथ को संबोधित करते हुए लिखते हैं,
आदरणीय मुख्यमंत्री जी
दुनिया भर में कोरोना महामारी वायरस की चपेट में सभी राज्य व शहर आ चुके हैं। जीविका के पहिये थम जाने से माध्यम वर्ग हो या निम्न वर्ग 'अगर सरकारी नौकरी में नहीं है' तो बमुश्किल ही अपने परिवार सहित जीवन यापन कर पा रहा है। इस स्थिति में शिक्षा मंत्रालय द्वारा स्कूलों की लेने के संबंध में जो गाइडलाइन्स जारी की गई है उसको देखते हुए तमाम अभिवावकों की तरफ से मैं आपसे निवेदन करता हूँ कि पूर्व में पारित 3 माह की फीस जिसको मासिक रूप से लेने का उल्लेख है कृपया परिवर्तन कर सभी बोर्ड के स्कूलों को फीस न लेने का आदेश देने की कृपा करें।
साथ ही इस वर्ष किसी भी नए पब्लिकेशन हाउस को किताबें मुद्रित करने की आज्ञा न दें। इसके स्थान पर सभी स्कूलों की प्रत्येक कक्षाओं में 2019 सत्र में चलने वाली किताबों से ही नए बच्चों को शिक्षा दी जाए। जिससे कि अभिवावकों को इस साल नई किताबों की खरीद पर लगने वाले धन की बचत हो सके।
जनज्वार से बात करते हुए व्यापार मंडल के टास्क फोर्स प्रभारी विनय वर्मा कहते हैं कि उनका एक बच्चा है जो दिल्ली पब्लिक स्कूल की आजादनगर ब्रांच में पढ़ता है, वो उसकी 7921 रुपये की तिमाही फीस कहाँ से दें। हमारी कोई सुन ही नहीं रहा। शिक्षकों की सुनने के लिए तो विधान परिषद में लोग बैठे ही हैं। लेकिन अभिवावकों की सुनने वाला कोई नहीं है। सभी अपनी अपनी वोटों की गणित में लगे हुए हैं, कोई बात नहीं आने वाला समय आने वाला चुनाव मौजूदा सत्ताधारियों को बताएगा। और माननीय उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा जी ने जो हम अभिवावकों को लॉलीपॉप दिया है आने वाले दिनों में जो लॉलीपॉप ये अभिवावक देंगे वो उनको ताउम्र याद रहेगा।
कानपुर के गोविंदनगर निवासी अभिवावक शैलेन्द्र दीक्षित ने जनज्वार से कहा कि अभिवावकों की समस्याओं में जो प्राइवेट या सरकारी स्कूल हैं, इन सभी को सरकार से बात करते हुए दया का बर्ताव करना चाहिए। आज जो प्राइवेट जॉब करने वाले हैं उनके पास इस समय कमाई का कोई साधन नहीं है। लेकिन रोजमर्रा के खर्चे उसी तेजी से चल रहे हैं। क्या ये स्कूल वाले आजीवन कमाने के बाद अपने स्टॉफ को सैलरी नहीं दे सकते? और बात ये भी नहीं है कि हम फीस नहीं देंगे। फीस देंगे पर इस समय हमें भी मुरौव्वत मिलनी चाहिए। शैलेन्द्र व उनके भाई के बेटे स्टेपिंग स्टोन्स की गोविंदनगर ब्रांच में कक्षा 12 के विद्यार्थी है।
वहीं दो बच्चों की तिमाही 8400 रुपये फीस भरने वाले शरद पांडेय ने जनज्वार के माध्यम से कहा कि मैं एक छोटा-मोटा व्यापारी हूँ और आज 40 दिनों से काम बंद है, स्कूल वाले फीस मांग रहे। मोदी जी के कहे अनुसार मैंने अपने 14-15 कर्मचारियों को सैलरी दी है, बिजली का बिल दिया है। जिस मकान में व्यापार करता हूँ वहां का किराया भी दिया। पैसे जो थे ख़तम हो गए, अब स्कूल वालों को कहां से दूँ? अगर मैं अपने कर्मचारियों को पैसे दे सकता हूँ, तो भरपेट कमाने वाले ये स्कूल संचालक अपने स्टॉफ को सैलरी नहीं दे सकते? सरकार को जरूर से जरूर ध्यान देकर उचित व ठोस कदम उठाने की दरकार है। शरद के दो बच्चे स्टेपिंग स्टोन्स की गोविंदनगर ब्रांच में क्लास 2 और क्लास 5 में पढ़ते हैं, जिनकी फीस बराबर है।
तो वहीं पेशे से एडवोकेट दुर्गेश मणि त्रिपाठी अपने फेसबुक पोस्ट में लिखते हैं की 25000 रुपये तिमाही 2000 बच्चे प्रति स्कूल यानी सालाना 20 करोड़। इतनी कमाई होगी तो नेता जी फीस क्यों कम करेंगे दिनेश शर्मा जी अब हम समझ गए आपकी दिक्कत। सारे स्कूल तो नेता जी लोगो के है चाहे पक्ष हो या विपक्ष मूर्ख तो ये पब्लिक और अभिभावक है जो आपका विरोध नही करते ये सोच कर की मेरा बच्चा पढ़ता।
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