पुलिस नाम सुनते ही , नाम लेते ही , या यूँ कहें की काम पड़ते ही दिल डर सा जाता है की क्या होगा , क्या पता कब क्या रगडा फास दे ये थाना पुलिस वाले ,. एक पिछला वाकया बताता हूँ आपको , की हुआ यूँ मेरे एक खास दोस्त की मोटर साइकिल पकड़ गई , जादा नहीं बस कोई एक अध् कागज काम था सायद , हम सभी ने बहोत मिन्नतें की खूब हाथ पैर जोड़े पर उसका फायदा ये हुआ की हमने जितनी बार भी हाथ पैर जोड़े उतने जादा हमपे धाराये लगाई गई , हमारे बिच एक फ्रेंड प्रेस वाला था उसने भी काफी मसक्कत की , लेकिन दिल्ली की बहादुर और hightech पुलिस ने उसे भी बेइज्जत कर के भगा दिया , की तभी किसी ने कहीं से जुगाड़ कर के किसी फ्रेंड ने किसी छुटभैया टाइप नेता से फ़ोन करा दिया , फिर क्या था आनन फानन में सारी aplication और धाराये हटा दी गयी और वाहन को छोड़ दिया जाता है , मैंने सोचा क्या यार भाई पुलिस , और हो भी क्यों न आखिर दूध का जला छाछ भी फूक कर पीता है
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