Sunday, 6 November 2011

नजर तेरी बुरी बुरका मै पहनू

नजर तेरी बुरी बुरका मै पहनू
ध्यान और आकर्षण के लिए आज के ज़माने में जो किया जाये वह काम है , अब "स्लुत्वाक" (slutwalk) की पब्लिसिटी व नारेबाजी को ही देखे ! टोरंटो के एक पुलिस ऑफिसर ने जब ये कहा की औरते अगर बलात्कारियो  का शिकार नहीं बनना चाहती तो उन्हें स्लुट्स ( चरित्रहीन बिंदास टाइप की औरते ) की तरह कपडे नहीं पहनने चाहिए !
इस पर संसार भर की नारियो ने जो आक्रोश जताया तो पुलिस ऑफिसर को माफ़ी मांगते हुए अपने सब्द वापिस लेने पड़े लेकिन कही न कही चिंगारी तो लग चुकी थी ! तथा इस मामले में संसार भर की नारिया एकजुट हो गई !
गुस्से औरतो ने जिस तरह रिएक्ट करके महज ब्रा और पैंटी में जुलुस निकला , अपना पछ मजबूत जताने के लिए अंगप्रदर्शन करते भड़काऊ कपडे पहनकर " बेशर्मी मोर्चा " संभाला कोई काबिले तारीफ बात नहीं है ! इससे क्या पुरुस वर्ग की मानसिकता बदल जाएगी , क्या उन्हें सुरक्षा मिल जाएगी ?
आज यह आन्दोलन पुरे विश्व में जोर पकड़ने लगा है ! साल के अंत तक ' सलूटवक '(SLUTWALK) का टार्गेट ३०० तक का है ! देश की राजधानी दिल्ली जहा औरतो के खिलाफ क्राइम बहुत जादा बढ़ गए हैं , यहाँ पर इस अभियान को युवको , बुजुर्गो और यहाँ तक सभी वर्ग के लोगो ने अपना समर्थन दिया है !
यह बात तो खैर उन्होंने ठीक कही है की सोच बदलनी चाहिए लेकिन साथ में जो कपड़ो की बात भी जुडी है , उससे मै बिलकुल इत्तेफाक नहीं रखता !
स्लुत्वाल्क में शिरकत करने वाली युवतियों ने अपने शारीर और कपड़ो पर जो नारे लिखे थे जहा कुछ सही थे , कुछ सही नहीं थे जैसे ; मेरी छोटी स्कर्ट का तुझसे कोई लेना देना नहीं है ; अगर बुरका घूँघट uncomfirtable है तो क्या छोटी स्कर्ट और बदन उधाणु ड्रेसेस comfirtable हैं ?
यह सही है की लडकियों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधो के पीछे केवल उनके रिविलिंग कपडे ही कारण नहीं है लेकिन निसंदेह यह एक कारण भी है और वो भी अहम् कारण ! हो सकता है उत्तेजित सख्स तत्काल अपनी हवास न मिटा पाने का फ्रस्टेशन लिए फिर मौका मिलते ही उसे पूरी करने का प्रयत्न करे या कर गुजरे !
तर्क दिया जाता है की ये कपडे स्पेगहेटी , आफ शोल्डर क्लीवज दर्शाते और नाभि से निचे , बैक से इनर वेअर झलकते फैशन में हैं और ये कुछ लडकियों व महिलाओ की पसंदीदा ड्रेस भी है वे उन्हें पब्लिक में क्यों नहीं पहन सकती ? संस्कृति के नाम पर संकुचित विचारधारा दर्शाते हुए इन पर इन द्रेस्सेस को पहनने की पाबन्दी लगाना कही से भी जायज नहीं है !
इस तरह के तर्क ज्यादातर तो ग्लैमर वर्ल्ड से सम्बंधित लोग ही देते है क्योकि यहाँ उनके अपने स्वार्थ निहित होती है ! किसी को माल बेचना है , किसी को खुद पहनने लायक फिगर नहीं रहा तो बहु बेटी को यह पहनाकर पैसा कमाना है यह आजादी नहीं बर्बादी है !
सोच बदलनी है ! लड़का लड़की बराबर है तो जिस बात के लिए लडको पर पाबन्दी नहीं , लड़कियों पर क्यों ? अपनी पसंद का लाइफ स्टाइल ( विवाह पूर्व सेक्स , लिव इन रिलेशन शिप इत्यादि ) अपनाने का कुछ वेस्टर्न स्टाइल के फूहड़ कपडे , कुछ उनसे भी दो कदम आगे अपने ढंग के कपडे पहनने का हक़ इन्हें क्यों न मिले !
इस अपसंस्कृति के चलते क्या हम एक अछे समाज की कल्पना कर सकते हैं ? मने या न मने लेकिन अपराध करने वाला जितना गिल्टी है , उसे जानबूझकर ललचाने टेंट कसने वाला भी निर्दोष नहीं कहलायेगा !
औरतो को मान लेना चाहिए की वो शारीरिक ताकत में पुरुसो का मुकाबला नहीं कर सकती फिर चाहे वो जुडो करते सिख ले या खेल के मैदान में झंडे गाड लें ! आत्म विस्वास अपनी जगह ठीक है लेकिन ओवर कांफिडेंस ले डूबता है ! इश्वर ने उन्हें जो छटी इन्द्री दी है उसका प्रयोग उनका सबसे बड़ा अस्सेत है ! उसे इस्तेमाल करने की ट्रेनिंग बेटियों को माँ बचपन से देगी तो जादा से जादा लडकिय आफत में पड़ने से बच सकती हैं !
समाज में औरतो के प्रति बढ़ते जुर्म के खिलाफ अवेइर्नेस्स  जगाना निसंदेह आज बहुत जरुरी है ! नुक्कड़ नाटक , कहानियो फिल्मो द्वारा पुरुसो को औरतो के प्रति संवेदनशील बनाने की दिशा में एक अच्छा कदम होगा ! जिस तरह अपनी ईमानदारी सच्चाई और डेडिकेशन से अन्ना हजारे ने बुरे के खिलाफ अलख जगाकर देश के कोने कोने तक अपनी आवाज पहुचाकर समर्थन प्राप्त किया , उसी तर्ज पर काश , सलूट वाल्क न होकर "रेस्पेक्ट वाल्क "परेड की जा रही होती !
मनीष दुबे - 08130073382 
kkumarmanish

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