Sunday, 6 November 2011

ये न्याय है या वो न्याय था ?

ये न्याय है या वो न्याय था ?1966 के बहुचर्चित शिवानी भटनागर केस के मुख्य आरोपी और पूर्व पुलिस के आइ जी आर के शर्मा को संदेह  का लाभ देते हुए दिल्ली उच्चन्ययालय ने बरी कर दिया है ! चार मुख्य आरोपियों आर के शर्मा , प्रदीप शर्मा , सत्यप्रकाश तथा श्रीभगवान में से केवल प्रदीप शर्मा को ही दोषी मानकर उसकी सजा बरक़रार रखी गई है जबकि सेष आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया !
शिवानी भटनागर इंडियन एक्सप्रेस की चीफ रिपोर्टर थी और कहा जाता है उनके सम्बन्ध आर के शर्मा से थे! आर के शर्मा उनसे पीछा छुड़ाना चाहते थे इसलिए उन्होंने भाड़े के कातिलो प्रदीप शर्मा ,सत्यप्रकाश व श्रीभगवान से शिवानी भटनागर का खून करवाया ! इन चारो आरोपियों को ट्रायल कोर्ट ने दोषी मानते हुए उमर्कैद की सजा सुने थी लेकिन हाई कोर्ट का निर्णय आया है की आर के शर्मा , सत्यप्रकाश और श्रीभगवान के खिलाफ अभियोजन पछ बिना संदेह केश साबित नहीं कर सकता !
पुलिस के आरोपों के अनुसार आर के शर्मा ने शिवानी से पीछा छुड़ाने के लिए श्रीभगवान से संपर्क किया और फिर भगवन ने आपने जानकार सत्यप्रकाश सेसम्पर्क किया ! सत्यप्रकाश ने आपने भतीजे प्रदीप शर्मा से हत्या करवाई ! हाई कोर्ट की बेंच का मानना है की ये बाते गवाहों  के आधार पर थी , जिनका कोई सबूत नहीं है ! ऐसे में ये सबूत मान्य नहीं है ! हत्या के लिए पचास हज़ार रुपये दिए जाने के भी सबूत नहीं हैं ! पुलिस ने जो रिकॉर्ड पेश किये वो भी अदालत को मान्य नहीं थे ! कोर्ट के अनुशार जिस नंबर को श्रीभगवान का नंबर बताया गया ,उसके भगवन का होने के भी साछ्य नहीं मिले ! कोर्ट का कहना था की कॉल रिकॉर्ड के साथ छेड़ छाड़ की गई है और पुलिस के द्वारा प्राप्त साछ्य उम्दा किस्म के नहीं थे !
यहाँ सवाल ये उठता है की यदि सदयंत्र की कड़ी साबित नहीं हो पाई तो प्रदीप शर्मा को सजा क्यों दी गई ! आखिर उसने किसी न किसी के कहने पर ही तो शिवानी हत्याकांड को अंजाम दिया होगा ! सवाल ये भी उठता है की कॉल रिकॉर्ड के साथ किसके इशारे पर छेड़ छाड़ की गई ! इस तरह के मामलो में पराया कोई आइ विटनेस नहीं होता और परिस्थिति जनक सछ्यो के आधार पर कोर्ट को निर्णय लेना होता है ! कोर्ट यदि चाहता तो कॉल रिकॉर्ड पुना निकलवाए जा सकते थे और इस बात की भी जाँच की जा सकती थी की मोबाईल फ़ोन     किसका है ! खैर मुकदमा सुप्रेमे कोर्ट में जायेगा ही और वहा फिर से सछ्यो की बारीकी से जाँच होगी !
दूसरा चर्चित मुकदमा उपहार कांड का आया है जिसमे सुप्रेमे कोर्ट ने पीडितो को दिए जाने वाला मुआबजा पहले से आधा कर दिया है ! इससे पहले हाई कोर्ट ने अप्रैल 2003 में दिए गए आपने निर्णय में प्रत्येक पीड़ित को 18 रुपये मुआबजा देने की बात कही थी जबकि  सुप्रेमे कोर्ट ने यह राशी घटाकर 10 लाख कर दी है ,यह तब जबकि पैसे की कीमत तब से काफी गिर चुकी है !
सुप्रेमे कोर्ट के इस फैसले से उपहार कांड के पीड़ित काफी निराश हुए है क्योकि हादसे से 15 वर्ष के पश्चात् इतनी राशी पीडितो के लिए जादा मायने नहीं रखती ! वैसे कोर्ट ने यह छुट  दे दी है की पीड़ित चाहे तो हाई कोर्ट में यह राशी बढ़ने के लिए  अपील कर सकते है किन्तु पीड़ित पहले ही 15 वर्ष से लड़ रहे है और न्याय मिलने में उनके साथ देरी होगी ,उतना ही उनके साथ अन्याय होगा !
न्यायपालिका से आम जनता को बहुत आशाये है और पिछले वर्सो में न्यायपालिका ने काफी साहसिक फैसले दिए है जिससे न्यायपालिका में आमजन की आस्था बढ़ी है ! ऐसे में न्याय के rachhko पर यह jimmedari aa jati है की ve aamjan के इस viswas को banaye rakhe !
 manish dubey

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