Tuesday, 30 July 2013

700 फिल्में, 26000 गाने, मोहम्मद रफी तू बहुत याद आया


NEWS DESK | NEWS WAR MEDIA PVT LTD -
आवाज की दुनिया के बेताज बादशाह मोहम्मद रफी को प्लेबैक गायन करने की प्रेरणा एक फकीर से मिली थी। ...और बडे़ भाई ने उनके मन में संगीत प्रेम को पहचाना। पंजाब के कोटला सुल्तान सिंह गांव में 24 दिसंबर 1924 को एक मध्यम वर्गीय मुस्लिम परिवार में जन्में रफी एक फकीर के गीतों को सुना करते थे, जिससे उनके दिल में संगीत के प्रति एक अटूट लगाव पैदा हो गया। रफी के बडे़ भाई हमीद ने मोहम्मद रफी के मन में संगीत के प्रति बढ़ते रुझान को पहचान लिया था और उन्हें इस राह पर आगे बढ़ने में प्रेरित किया। 13 साल की उम्र में पहला स्टेज शो लाहौर में रफी संगीत की शिक्षा उस्ताद अव्दुल वाहिद खान से लेने लगे और साथ ही उन्होंने गुलाम अली खान से भारतीय शास्त्रीय संगीत भी सीखना शरू कर दिया। एक बार हमीद रफी को लेकर केएल सहगल के संगीत कार्यक्रम में गये। लेकिन बिजली नहीं रहने के कारण केएल सहगल ने गाने से इंकार कर दिया। हमीद ने कार्यक्रम के संचालक से गुजारिश की वह उनके भाई रफी को गाने का मौका दें। संचालक के राजी होने पर रफी ने पहली बार 13 वर्ष की उम्र में अपना पहला गीत स्टेज पर दर्शकों के बीच पेश किया। दर्शकों के बीच बैठे संगीतकार श्याम सुंदर को उनका गाना अच्छा लगा और उन्होंने रफी को मुंबई आने के लिये न्यौता दिया। श्याम सुदंर के संगीत निर्देशन में रफी ने अपना पहला गाना 'सोनिये नी हिरीये नी' पार्श्व गायिका जीनत बेगम के साथ एक पंजाबी फिल्म गुल बलोच के लिये गाया। वर्ष 1944 मे नौशाद के संगीत निर्देशन में उन्हें अपना पहला हिन्दी गाना 'हिन्दुस्तान के हम हैं' फिल्म पहले आप के लिये गाया। 700 फिल्में, 26000 गाने वर्ष 1949 मे नौशाद के संगीत निर्देशन मे दुलारी फिल्म में गाये गीत 'सुहानी रात ढ़ल चुकी' के जरिये रफी सफलता की ऊंचाइयों पर पहुंच गये और इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। दिलीप कुमार, देवानंद, शम्मी कपूर, राजेन्द्र कुमार, शशि कपूर, राजकुमार जैसे नामचीन नायकों की आवाज कहे जाने वाले रफी अपने संपूर्ण सिने कैरियर में लगभग 700 फिल्मों के लिये 26000 से भी ज्यादा गीत गाये। मोहम्मद रफी ने हिन्दी फिल्मों के अलावे मराठी और तेलगू फिल्मों के लिये भी गाने गाये। मोहम्मद रफी अपने करियर में 6 बार फिल्म फेयर अवार्ड से सम्मानित किये गये। वर्ष 1965 में रफी पदमश्री पुरस्कार से भी सम्मानित किये गये। शूड आई लीव 30 जुलाई, 1980 को 'आस पास' फिल्म के गाने 'शाम क्यूं उदास है दोस्त' गाने के पूरा करने के बाद जब रफी ने लक्ष्मीकांत प्यारे लाल से कहा- शूड आई लीव, तो यह सुनकर लक्ष्मीकांत प्यारे लाल अचंभित हो गये। क्‍योंकि इसके पहले रफी ने उनसे कभी इस तरह की बात नही की थी। अगले दिन 31 जुलाई, 1980 को रफी को दिल का दौरा पड़ा और वह इस दुनिया को छोड़कर चले गये। लता के साथ हुयी थी रफी की अनबन आवाज की दुनिया के बेताज बादशाह मोहम्मद रफी फिल्म इंडस्ट्री में मृदु स्वाभाव के कारण जाने जाते थे, लेकिन एक बार उनकी कोकिल कंठ लता मंगेश्कर के साथ अनबन हो गयी थी। मोहम्मद रफी ने लता मंगेशकर के साथ सैकड़ो गीत गाये थे, लेकिन एक वक्‍त ऐसा भी आया था जब रफी ने लता से बातचीत तक करनी बंद कर दी थी। लता मंगेशकर गानों पर रायल्टी की पक्षधर थीं, जबकि रफी ने कभी भी रॉयल्टी की मांग नहीं की। रफी साहब मानते थे कि एक बार जब निर्माताओं ने गाने के पैसे दे दिए तो फिर रायल्टी किस बात की मांगी जाए। दोनों के बीच विवाद इतना बढा़ कि मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर के बीच बातचीत भी बंद हो गई और दोनों ने एक साथ गीत गाने से इंकार कर दिया। हालांकि चार वर्ष के बाद अभिनेत्री नरगिस के प्रयास से दोनों ने एक साथ एक कार्यक्रम में 'दिल पुकारे' गीत गाया। अमिताभ बच्चन के बहुत बडे़ प्रशंसक थे रफी मोहम्मद रफी बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन के बहुत बड़े प्रशंसक थे। रफी फिल्म देखने के शौकीन नहीं थे लेकिन कभी-कभी वह फिल्म देख लिया करते थे। एक बार रफी ने अमिताभ बच्चन की फिल्म दीवार देखी। दीवार देखने के बाद रफी अमिताभ के बहुत बड़े प्रशंसक बन गये। वर्ष 198 में प्रदर्शित फिल्म नसीब में रफी को अमिताभ के साथ युगल गीत 'चल चल मेरे भाई' गाने का अवसर मिला। अमिताभ के साथ इस गीत को गाने के बाद रफी बेहद खुश हुये थे। जब रफी साहब अपने घर पहुंचे तो उन्होंने अपने परिवार के लोगो को अपने पसंदीदा अभिनेता अमिताभ के साथ गाने की बात को खुश होते हुये बताया था। शोले देखी तीन बार अमिताभ के अलावा रफी को शम्मी कपूर और धर्मेन्द्र की फिल्में भी बेहद पसंद आती थी। मोहम्मद रफी को अमिताभ-धर्मेन्द्र की फिल्म शोले बेहद पंसद थी और उन्होंने इसे तीन बार देखा था। [पुण्यतिथि 31 जुलाई के अवसर पर]

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