Tuesday, 23 July 2013

चमक खो रहा है ब्रांड आईआईटी


विचार - आनंद कुमार, संस्थापक, सुपर-30 NEWS WAR MEDIA - एक जमाना वह भी था, जब अमेरिका में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जनरल वेस्ले क्लार्क ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान यह घोषणा की थी कि अमेरिका में जो भी छात्र आईआईटी से पढ़ाई पूरी करके आएगा, उसे तत्काल अमेरिकी ग्रीनकार्ड दे दिया जाएगा। मशहूर अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स में साल 2005 में प्रकाशित एक लेख में कहा गया था कि आईआईटी में प्रवेश अमेरिका के हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी में प्रवेश पाने से भी अधिक कठिन है। आईआईटी के गौरव का अंदाजा लगाने के लिए ये दो ही उदाहरण काफी हैं। लेकिन आखिर आईआईटी को हो क्या गया है? क्यों कल तक गौरव का विषय रहे आईआईटी संस्थान में कई बच्चे अपना दाखिला नहीं कराना चाह रहे हैं? आखिर बात क्या है कि इस बार आईआईटी की 769 सीटें खाली रह गईं? कुछ साल पहले तक जहां आईआईटी के एक स्टूडेंट को पढ़ाई पूरी करने से पहले औसतन दो से तीन नौकरियों का ऑफर मिल जाता था और वे खुद तय करते थे कि उनमें से कौन सी नौकरी अच्छी है और किसमें कितना पैकेज मिल रहा है। आज वहीं, आईआईटी से पढ़ाई पूरी करने के बावजूद आधे से भी ज्यादा विद्यार्थी नौकरी के लिए भटक रहे हैं। तो क्या ब्रांड आईआईटी अब अपनी अहमियत खो रहा है? पिछले वर्षों में नारायण मूर्ति जैसे उद्योग जगत के महारथी ने भी आईआईटी की ब्रांड वैल्यू पर प्रश्न खड़े किए। इतना ही नहीं, आईआईटी की इस वर्ष की नई चयन-प्रक्रिया इतनी अव्यवहारिक थी कि 79 विद्यार्थियों के आईआईटी प्रवेश प्रक्रिया पास करने के बावजूद उनका इसमें पढ़ने का सपना साकार नहीं हो सका। देश के सर्वश्रेष्ठ संस्थान आईआईटी की घटती लोकप्रियता और इसकी जटिल चयन-प्रक्रिया एक गंभीर चिंता का विषय है। आईआईटी को लेकर हमारी सारी सोच बदलाव की मांग कर रही है। कहते हैं बदलाव की शुरुआत छोटे फैसलों से होती है। जाने वह कौन सी घड़ी थी, जिसमें केंद्रीय मानव संसाधन विकास विभाग ने आईआईटी प्रवेश परीक्षा में बदलाव का बिगुल फूंका। किसे पता था कि यह बदलाव आईआईटी के इतिहास से लेकर वर्तमान तक को बदल देगा और लोग इन आईआईटी में नामांकन के बदले कुछ दूसरे संस्थानों में दाखिले को ज्यादा गौरव की बात समझोंगे। इसका अंदेशा पहले से ही था, तभी तो आईआईटी की प्रवेश परीक्षा के नए पैटर्न का विरोध किया गया था। इस संबंध में मैने तत्कालीन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल से कई मुलाकातें कीं और उन्हें समझाने का प्रयास किया था कि यह फॉर्मूला न सिर्फ विफल होगा, बल्कि यह गरीब विरोधी भी होगा। तब सरकार ने यह फैसला पहली बार किया था कि एक राष्ट्र-एक परीक्षा आयोजित की जाएगी और वही परीक्षा आईआईटी समेत देश के तमाम इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिले का आधार बनेगा। इस परीक्षा में 12वीं कक्षा के अंक को जोड़कर नतीजे प्रकाशित का निर्णय लिया गया। और फिर आईआईटी प्रवेश परीक्षा में शामिल होने के लिए एक अखिल भारतीय परीक्षा में सफल होना तो जरूरी था ही। साथ ही, 12वीं कक्षा के विभिन्न बोर्डो में टॉप 20 परसेंटाइल के रेस में होना भी एक अनिवार्यता थी। इस फैसले ने एक बड़ा बदलाव कर दिया। गरीब तबके के बच्चे, जिनमें प्राकृतिक रूप से क्षमता थी, लेकिन वे स्कूलों की भारी-भरकम फीस को वहन नहीं कर सकते थे, इस दौड़ में पिछड़ने लगे। साथ ही, परसेंटाइल निकालने का तरीका इतना विवादास्पद और जटिल है कि आज भी कई विद्यार्थी, शिक्षक तथा अभिभावक इसे नहीं समझ पाए हैं। यही नहीं, मौजूदा पद्धति में यह भी कहा गया है कि आईआईटी में प्रवेश के लिए दो अलग-अलग परीक्षाएं होंगी- मेन व एडवांस। सरकार के इस फैसले से विद्यार्थियों पर न सिर्फ दबाव बढ़ा, बल्कि कोचिंग माफियाओं के घर की खिड़की सीधे बाजार में खुल गई। सीधे रूप में समझें, तो अब बच्चों को पहले की अपेक्षा अधिक कोचिंग की जरूरत पड़ रही है। एक कोचिंग बारहवीं की परीक्षा के लिए, एक मेन टेस्ट के लिए और एक एडवांस टेस्ट के लिए। संपन्न घर के बच्चे तो कोचिंग के फायदे उठा रहे हैं, लेकिन बेचारे निर्धन इस दौर में कमजोर महसूस कर रहे हैं। हालांकि, उस वक्त मानव संसाधन मंत्रालय के इस दावे को भी मैंने गलत बताया था कि नए पैटर्न में कोचिंग की जरूरत नहीं पड़ेगी। आज की तारीख में भारत में चुनौती इस बात की है कि दुनिया के 100 श्रेष्ठ कॉलेजों की सूची में आईआईटी को प्रवेश दिलाया जा सके। एक बड़ी सच्चाई यह है कि आज मंदी के दौर से बाजार गुजर रहा है। छात्रों के बीच चुनौती इस बात की है कि वे अच्छे कॉलेजों से पढ़ाई करें। अगर वे ऐसा नहीं करेंगे, तो किसी अच्छी कंपनी में उन्हें नौकरी नहीं मिलेगी। बगैर अच्छे शिक्षकों, भवन और संसाधनों के पिछले कुछ वर्षों में कई नए आईआईटी धड़ाधड़ खुल गए हैं। लिहाजा वैसे आईआईटी संस्थान जिसकी रैंकिंग, फैकल्टी और पढ़ाई की विकसित सुविधाएं नहीं हैं, वहां नामांकन लेने से छात्र कतरा रहे हैं और अन्य कॉलेजों में नामांकन ले रहे हैं। स्थितियां इससे भी बुरी न हों, इसके लिए कदम उठाने की जरूरत है। यकीन मानिए, कोई भी समस्या उसके समाधान से बड़ी नहीं होती। आज जरूरत इस बात की है कि त्वरित फैसले लेकर बदलाव किए जाएं। आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में शामिल होने के लिए सिर्फ दो मौके मिलते हैं, जिसका लाभ ग्रामीण तथा निर्धन छात्र को नहीं मिल पाता है। जानकारी के अभाव में कमजोर तबके के विद्यार्थियों को आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में भाग लेने का अवसर नहीं मिलता है और जब तक उन्हें जानकारी मिलती है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है। अब आईआईटी जैसे संस्थानों तक सफर गांव-देहात के प्रतिभाओं के लिए बहुत कठिन हो रहा है। प्रवेश के दो मौकों को हटाकर, कम से कम तीन मौके दिए जाने चाहिए। आईआईटी में मूल्यांकन की जटिल पद्धति को बदलकर उसका सरलीकरण किया जाना बहुत जरूरी है। वैसे बच्चों को प्रवेश परीक्षा में बैठने की अनुमति प्रदान की जानी चाहिए, जो 60 फीसदी अंक लाते हों। आईआईटी में प्रवेश की परीक्षा को अन्य दूसरी परीक्षाओं से दूर रखा जाए, ताकि इसकी गरिमा अक्षुण्ण रखी जा सके। किसी भी विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा सिर्फ पूर्व-स्नातक तक की पढ़ाई पर निर्धारित नहीं की जा सकती है। नए खोले गए आईआईटी में भी अच्छे शोध व पढ़ाई हों, इनके लिए अच्छे शिक्षकों की बहाली और उनकी निरंतर ट्रेनिंग की जरूरत पर ध्यान देना होगा। अगर वक्त रहते सरकार यह कदम नहीं उठाती है, तो आने वाले समय में आईआईटी में खाली सीटों की संख्या में और इजाफा ही होगा। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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