Tuesday, 30 July 2013

सियासी तालों में कैद केदारनाथ का सच


NEWS WAR | देहरादून
जल प्रलय को 45 दिन बीत गए, लेकिन केदारनाथ मंदिर को हुए नुकसान पर तस्वीर साफ नहीं हो पाई है। राज्य सरकार, केंद्र सरकार, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) और भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण (जीएसआइ) के अलग-अलग बयान मामले को और भी पेचीदा बना रहे हैं। मंदिर का जायजा लेकर लौटी एएसआइ की टीम ने 14 और 15 जुलाई को मंदिर को भारी नुकसान की आशंका जताई तो 18 जुलाई को बताया कि मंदिर पूरी तरह सुरक्षित है। अब एएसआइ और जीएसआइ की टीम मंगलवार को एक बार फिर केदारनाथ का दौरा करेगी। दूसरी ओर, रविवार को कोणार्क में केंद्रीय संस्कृति मंत्री चंद्रेश कुमारी ने मंदिर को बुरी तरह क्षतिग्रस्त बताया। इन विरोधाभाषी बयानों के बीच श्रद्धालु असमंजस में है कि हकीकत क्या है। मंदिर में जल्द से जल्द पूजा शुरू करवाने की सरकारी कसरत के बीच मंदिर को हुए नुकसान की हकीकत रहस्य बनती जा रही है। राज्य सरकार ने केदारनाथ में मलबा हटाने के लिए तेजी दिखाते हुए इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट इंडिया लि. (ईपीआइएल) को काम सौंपा। पहले इसमें एएसआइ और जीएसआइ से तकनीकी मदद लेने की बात कही गई, लेकिन ऐन वक्त पर किनारा कर लिया गया। मंदिर के नुकसान को लेकर सरकार की मंशा तब सवालों के घेरे में आई जब मंदिर का जायजा लेने के लिए तैयार खड़े दिल्ली व आगरा से पहुंचे एएसआइ के आला अधिकारियों व भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण की टीम को मौसम खराब होने का हवाला देकर रोक दिया गया। इसके बाद शुक्रवार 12 जुलाई को सरकार ने देहरादून सर्किल के तीन निचले स्तर के अधिकारियों को मंदिर में जाने की अनुमति दी। अधिकारियों ने मंदिर में भारी क्षति की रिपोर्ट तैयार की। हालांकि इसके तीन दिन के भीतर एएसआइ अधिकारी अपनी बात से पलट गए और मंदिर में कम नुकसान की बात कहने लगे। इसके बाद मंदिर से मलबा हटाने में तकनीकी मदद को पहुंचे एएसआइ के दिल्ली से आए निदेशक स्तर के अधिकारियों को हेलीकॉप्टर न होने का बहाना बनाकर बैरंग लौटा दिया गया। जबकि इसी दौरान कई हेलीकॉप्टर सिर्फ नेताओं को ढो रहे थे।

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