Saturday, 20 July 2013

REALITY CHECK: कहीं यहां भी 'मौत' न बन जाए मिड-डे मील

वाराणसी/ कानपुर. सरकार ने गांवों में बढ़ती अशिक्षा को देखते हुए मिड-डे मील योजना की शुरुआत की थी। माना जा रहा था कि खाने के लालच में ही सही, लेकिन गांवों के बच्चे अशिक्षित नहीं रहेंगे। लेकिन सरकार की इस योजना के अंतर्गत बनने वाला खाना बच्चों के लिए ज़हर साबित हो रहा है। बिहार में मिड-डे मील खाने से हुई बच्चों की मौत के बाद भी प्रदेश की सरकार ने कोई खास सबक नहीं लिया है। दैनिकभास्कर.कॉम ने राज्य के कुछ जिलों के सरकारी स्कूलों में रियलिटी चैक किया, तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। कानपुर के कल्यानपुर ब्लॉक के और चंदौली के चकिया तहसील के प्राथमिक विद्यालय ददरा में बच्चों को मिलने वाला खाना बेहद गंदे और प्रदूषित माहौल में बनाया जाता है। इससे खाने की गुणवत्ता का अंदाजा लगाया जा सकता है। चंदौली में लगा हैण्डपम्प महीनों से ख़राब पड़ा है। बच्चे गांव के गुले कुएं का पानी पीने को मजबूर हैं। ग्रामीण बताते हैं कि जिस कुएं से बच्चे पानी पीते है, पिछले कई वर्षो से उसकी सफ़ाई नहीं हुई है। रसोई में गैस की बजाय उपले पर खाना बनाया जा रहा है और वहां लगा अग्निशामक यंत्र खस्ता हाल है।रसोई घर के आसपास सफ़ाई तो रहती ही नहीं है। साथ ही वहां भोजन की तलाश में घूमते जानवर दिखाई पड़ जाते हैं। हालांकि, वाराणसी और कानपुर में अधिकारियों ने इस संबंध में स्कूलों को आदेश जारी किए हैं। प्रमुख निर्देश बच्चों को खाना परसने से पहले प्रिंसीपल औऱ अद्यापकों द्वारा उसे चखने का है। रसोई घर और बच्चों के खाने की जगह पर साफ़-सफाई का विशेष ध्यान रखने का भी निर्देश दिया गया है। इसके साथ ही जिले के सभी खंड शिक्षा अधिकारियों को हर दिन स्कूलों का निरीक्षण करने का कड़ा निर्देश दिया है। इस मामले में लापरवाही की बात सामने आने पर सख्त कार्यवाही की बात भी कही है।

No comments:

Post a Comment