रघु रमन, विशेषज्ञ, आंतरिक सुरक्षा | news war -

ब्राजील में टिव्ट्र का इस्तेमाल करने वाले सबसे ज्यादा हैं। इसी पर 11 जून 2010 को एक अभियान शुरू हुआ- काला एक बोका गलवाओ। उस साल फुटबॉल के विश्व कप फीफा में इसका काफी प्रचार हुआ। यह अभियान ब्राजील के एक दुर्लभ और लगभग लुप्त हो चुके पक्षी गलवाओ को बचाने का था। लेडी गागा ने इस अभियान के लिए एक गीत गाया जिसमें इस पक्षी को बचाने की बात कही गई थी। ब्राजील के सबसे लोकप्रिय लेखक पाउलो कोएल्हो ने इसके साथ ‘सिलएंटियम गलवनस’ नाम का एक नारा भी जोड़ दिया जो कि वास्तव में होम्योपैथी की एक दवा का नाम है। विकीपीडिया ने इस पर पूरे दो पेज की सामग्री दी। चार दिन में दुनिया भर के करोड़ों लोग गलवाओ को लेकर जागरूक हो गए। तकनीक के विशरद लोगों ने सोशल मीडिया की ताकत पर कसीदे काढ़ने शुरू कर दिए कि कैसे विश्व कप के मौके का फायदा उठा कर एक बड़ा अभियान खड़ा कर दिया गया।
इस अभियान की असल खासियत यह थी कि यह अभियान पूरी तरह झूठा था। इसे इस दौर का सबसे बड़ा फरेब करार दिया गया। इस नाम का कोई पक्षी ही नहीं होता। यह पूरा मामला दरअसल फुटबॉल के एक ब्राजीली कमेंटेटर गलवाओ बुएनो पर मजाक का था, जिसे उनकी कमेंटरी को बोर मानने वालों लोगों ने शुरू किया था। ‘काला ए बोका गलवाओ’ का अर्थ था गलवाओ चुप हो जाओ। इसके लिए लेडी गागा को जो गाना तैयार किया गया वह भी फर्जी था। पाउलो कोएल्हो का बयान जरूर फर्जी नहीं था, लेकिन उन्होंने जो कहा उसका अर्थ भी यही था कि गलवाओ चुप हो जाओ। इस मामले ने पूरे चार दिन तक करोड़ों लोगों के साथ ही विकीपीडिया को मूर्ख बनाए रखा।
लेकिन यह सोशल मीडिया के दुरुपयोग का हानि रहित उदाहरण है। इससे कुछ लोगों के अहम को भले ही ठेस लगी हो लेकिन इससे कोई बहुत ज्यादा आहत नहीं हुआ। बदकिस्मती से ऐसे उदाहरण भी हैं जो इतने हानि रहित नहीं हैं। टैरी जोंस का उदाहरण तो हम सबको याद ही होगा। फ्लोरिडा के एक छोटे से कस्बे गेंसेविले का यह इस्लाम विरोधी पादरी अपनी चर्च के बाहर इतने उग्र भाषण देता था स्थानीय अधिकारियों को उसे वहां से हटाना पड़ा। जुलाई 2010 तक टैरी को कोई नहीं जानता था। फिर उसने घोषणा कर दी कि वह कुरान को सार्वजनिक रूप से जलाएगा। मुख्यधारा के मीडिया को इस बात का अहसास था कि इसका क्या असर हो सकता है इसलिए ज्यादातर ने उसकी खबरों को नहीं दिखाया। लेकिन फ्री लांसर के तौर पर काम करने वाले एक पत्रकार एन्ड्रयू फोर्ड ने उसकी खबर को समाचार एजेंसी एएफपी पर जारी कर दिया। जारी करते ही यह खबर अखबार में तो नहीं छपी लेकिन गूगल और याहू पर दिखने लगी। कुछ ही घंटों में यह न जाने कितने ब्लॉग पर दिखने लगी और इतनी बड़ी हो गई कि अखबारों के लिए भी उसे नजरंदाज करना नामुमकिन हो गया। ‘ट्रस्ट मी- आई एम लाइंग’ के लेखक रेयान हॉलीडे का कहना है कि चौबीसों घंटे चलने वाले मीडिया पर खबरें ब्रेक करने का जो दबाव होता है वह उन्हें कईं बार सोशल मीडिया की ओर ले जाता है। और सोशल मीडिया का चारित्र ही ऐसा है कि वह तेज होता है, असावधान होता है, अक्सर सही नहीं होता और बहुत खराब समझ पर खड़ा होता है। 140 कैरेक्टर में किसी हालात के सारे पक्ष आप नहीं पेश कर सकते, यह सिर्फ सनसनीखेज होता है।
टैरी का मामला इतना ज्यादा उछल गया कि कुछ दिन में बराक ओबामा, हिलेरी क्लिंटन और अफगानिस्तान में अमेरिकी फौज के कमांडर डेविड पैटरस को भी इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा। नौ सितंबर को एक ऐसी चिट्ठी सामने आई जिसमें कहा गया था कि इस मामले से पूरी दुनिया के सामने एक बड़ा खतरा खड़ा हो गया है और अमेरिका में ऐसा कोई कानून नहीं है जिससे इसे रोका जा सके। टैरी जोंस अपनी जिद पर अड़े थे और सोशल मीडिया में उन्हें खासा प्रचार मिल रहा था। दूसरी तरफ इसकी प्रतिक्रिया अफगानिस्तान में हुई जहां 30 लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा, जिनमें संयुक्त राष्ट्र अभियान के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता भी थे। हालात इतने बिगड़े कि कईं एनजीओ ने अपने पैर ही अफगानिस्तान से खींच लिए।
अक्सर हम ‘सोशल मीडिया’ की इस तकनीकी परिभाषा में उलझ जाते हैं कि यह ऐसा मीडिया है जिस पर व्यक्ति या कंपनी का स्वामित्व नहीं है। इससे यह मिथक भी बनता है कि यह मीडिया समाजिक है। लेकिन जरूरी नहीं है कि यह बात हमेशा ही सच हो। ऐसे बहुत सारे उदाहरण हैं जिनमें इसके जरिये बलात्कार की धमकी दी गई और साथ ही यह धमकी भी कि इसका वीडियो बनाकर इंटरनेट पर डाल दिया जाएगा। कईं मामलों में पीड़िता को धमकी इसलिए दी गई ताकि वह अधिकारियों से शिकायत न करे, पीड़िता उनके खिलाफ गवाही न दे इसके लिए उसे ब्लैक मेल किया गया। वैसे तो बलात्कार कोई नया अपराध नहीं है लेकिन नई बात है पीड़िता को परेशान करने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल।
इसी तरह सोशल मीडिया का इस्तेमाल लोगों को भड़काने, दंगा कराने, अफवाहें फैलाने, उग्र सोच वालों की भर्ती करने और यहां तक कि आतंकवादियों को फर्जी कागजात से लेकर बम और जहर बनाने का प्रशिक्षण देने तक के लिए किया जा रहा है। ऐसे नापाक कामों को अंजाम देने वाले उन अच्छे लोगों से कहीं तेजी से सक्रिय हैं जो सोशल मीडिया के जरिये शांति स्थापित करना चाहते हैं।
सोशल मीडिया भविष्य का माध्यम है इसलिए यह जरूरी है कि इसका इस्तेमाल करने वालों को इसकी खामियों और इसके खतरों का अहसास होना चाहिए। खासकर इसलिए भी इस मीडिया में 13 साल के बच्चे भी कानूनी रूप से प्रवेश कर सकते हैं, उस दुनिया में जहां उनकी मुलाकात तरह तरह की नीयत वाले अजनबियों से होनी है। और सच तो यह है कि सोशल मीडिया को ज्यादा सुरक्षित और जवाबदेह बनाने काम उन लोगों को ही करना होगा जो इस तकनीकी दुनिया को ज्यादा अच्छी तरह समझते हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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