कुछ समय बाद वो हुआ जिसकी अमर या उसके जैसे हालात वाले किसी अन्य बंदे ने कभी शायद ही कल्पना तक की हो। वो पल वहां की बीड़ी का था।जेल की बीड़ी का। जिसे तैयार करने वाला दशहरा का रावण बनाने मे भी इतनी उग्रता व्यग्रता ना दिखाये जितनी तीव्रता यहाँ थी। रजिस्टर से एक कागज फाडा गया। फिर उससे एक डेढ इंच का पतला चिटनुमा कागज निकालकर गोल गोल घुमाकर नीचे से ऊपर तरीक़े से खेंचा। नीचे पतली उपर चार गुनी मोटी, बंडल वाली बीडी स्टाइल पर उससे पाँच गुनी बड़ी थी। सेल्फ मेड व अधिक दावेदारी उसका कारण दिख रही थी।
अब हाथ मे खाने वाली तम्बाकू मात्रानुसार लेकर एक बंदे ने बैरक के मेट से आग के प्रबंध की इच्छा की। वो तुरंत खड़ा हुआ हाथ में कछुए का टुकडा (काँईल) लेकर मुंह मे दबाया, बाथरूम से सटी दीवार पर चढ़ गया, उपर पंखा जिसका एक वायर टूटा हुआ था। उसने वो वायर आपस मे भिडाया। चट चट की आवाज के साथ चिनगारियां निकलीं ।अब मुंह मे दबा कछुए का टुकड़ा उन तारों से निकलती चिनगारियों से भिडा भिडा कर जला दिया उसने। ये सारे क्रियाकलाप देखकर चकित था अमर। कारण पहली बार थूंक कछुआ करेंट का सीधा प्रसारण देखा था उसकी नंगी आँखो ने। तब के ज़माने मे पत्थर से पत्थर रगड़कर आग का प्रकटन व अब दियासलाई,लाईटर के इस नवयुग में भला हो अग्निदेव का कि आप आए और ये थूक कछुआ करेंट का समागम साथ लाए। धन्य हो आप मानवों।
कछुए के उस टुकड़े पर भी एक काला छोटा टुकड़ा चपटा करके उसके अग्रभाग पर रखा गया। जिज्ञासू मन ने उस छोटी सी वस्तू की जानकारी की तो पता चला कि ये दम है, दम यानी चरस। तब तक एक ने उसके जलने की अनोखी खुशबू को सूंघकर कहा भाई हो गया। कछुए के टुकड़े को हाथ मे ली हुई तम्बाकू मे पलटा,वो काला टुकड़ा उसमे गिर गया, उसमे अच्छी तरह मिलाया। फिर मेट को इशारा,समझदार प्रभु का समझदार सेवक, तत्काल काम हुआ चाय की पत्ती लाई गई। उसे हल्की मात्रा मे उसमें डाला तथा अच्छी तरह मिलाया,मिश्रण बनकर तैयार। उसके बाद उसे कागज की बनाई डाई मे भरा गया। अच्छी तरह ठोंक बजा कर भरने के बाद आगे के सिरे को बंद कर दिया फिर उसी कछुए से उसे मुखागनी प्रदान की गई। उसे पीने के उनके तरीके के आगे कोई चोटी का रईश और उसकी किसी मंहगे ब्रांड वाली सिगरेट, सिगार सब फेल, सिर्फ ये पास। और पास हो भी क्यों ना, उनके मुताबिक इस एक बीडी को बनाने की लागत दो सौ से ढाई सौ के बीच आती है।
अब बीडी पीने वाले लोग समान प्रभु के,बाकी सब उसके अनुयाई,उसके धर्म को मानने वाले। सभी के दिल मे बस एक ही हूक,कि कब प्रभु उन पर एक दयाद्रषटी डाल दें। चार के ग्रुप मे तीसरा नंबर अमर का। बीडी बढ़ाई गयी, मना किया अमर ने, दुबारा बढ़ाई गयी,फिर मना किया। एक झुलसती हुई सी आवाज उसके कानन मे पड़ी अबे पी। अमर ने आंखें ऊपर उठाई, मुँह से धुँआ अभी भी छललों की शक्ल मे निकल रहा था, उससे जिसकी आवाज थी ये। ना चाहते हुए भी बीडी पीनी पड़ी उसे। एक कश मारा समझ मे नहीं आया, थोड़ा रूककर दूसरा कश मारा, आवाज आई एक और, उनकी भी बात रखने का मारा। थोड़ी ही देर बाद दिमाग सुन्न हो गया,मानो छह मिनट बाद तक धुआँ अभी भी निकल रहा हो। सामने सब भिन्न आउट हो चुका था। टयूबलाईटें तो सब जल रहीं थीं पर फ्यूज कहीं उड़ चुका था। पौवे का चार पैग अदधा तक रोज, पर कभी ऐसा नहीं हुआ फिर यहाँ सामने की टीवी दो होकर टीवियों में ना जाने क्यों तबदील हो चुकी थी। दिमाग को झटका दिया,तब टीवी अपनी जगह पर यथावत आ सकी। सामने के सूरमा हर एक कश के बाद और बड़े होते जा रहे थे। सारे अनुयाई दिल पर पत्थर रखकर इंतजार कर रहे थे। आखिर मे वो वक्त भी आया जब समान शिव बचा खुचा वो बीडी का टुकड़ा अपने भकतों को दे चुके थे। वो भी खींच खींच कर अपनी जिंदगी को बढ़ाने सा लगे। और तब तक खींचते रहे, जब तक उसकी आंच से उनकी उंगलियां ना जलने लगी। बीडी अपने आप छूटकर उनके हाथों से गिर गयी। दंग था अमर ये धुआँ चुसाऊ सीन देखकर। और तो और वो बीडी पीने के दौरान किसी और की तरफ देखते भी नहीं। कारण कहीं कोई अन्य शिवगण उनसे एक आध कश की डिमांड ना कर बैठे।
सामने सोनी टीवी पर क्राईम पेट्रोल के बैक टू बैक नो रिपीटस सलोगन वाले ऐपिसोड चल रहे थे। जो माहौल को और भी अधिक सनसनीखेज बनाने मे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे।

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