Tuesday, 2 October 2018

jail journalism, कंटेंट का बाप


आज सोमवार 12 मार्च था। पिछले हफ्ते दिल्ली मे आए हल्के फुलके भूकंप का असर अमर की बैरक मे भी हुआ था। भूकंप का झटका तो नहीं पर कुछ उससे कमतर भी नहीं हुआ था। सारा सामान फटटे बालटी अरतन बरतन सब कुछ बिखरा पड़ा था। अमर ने जानकारी ली तो पता चला बैरक मे टीएसपी (तमिलनाडू पुलिस) की सरचिंग आई है। कल शाम उसकी बैरक के दो पझों मे कहासुनी हो गई थी और ये सरचिंग उसकी मुखबिरी का नतीजा थी। सभी के फटटे, सामान, धोने खाने के डिब्बे यहाँ तक की शरीर मे लगाने वाले तेल क्रीम की शीशियां तक खोल कर चेक कर डाली गई। सारा सीन रामायण की अशोक वाटिका के उजड़ने सा लग दिख रहा था। उस समय उसे हनुमान जी ने फल खाने व रावण भाई से लागतबाजी के चलते उजाडी़ थी, पर यहाँ तो उन्हें खाली पीली परेशान करने के लिए उजाडा़ गया था।आराम और चैन की ड्यूटी करने वाले ये लोग अगर काम भी करें तो हमारी परेशानी विकराल रुप ले लेती है। क्या आखिर फायदा ही मिलता है इन्हें यहाँ सिवाय कमाई का जपिया ईजाद करने के। जब चाहा जिसको बुला लिया, जब चाहा किसी को उड़ा दिया। अनवरत बोलता जा रहा था अमर कि तभी कई सारी आवाजें एक साथ उभरीं "भाई इसी बात की तो जेल है, ये सब यहाँ तो चलता ही रहता है।

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