Tuesday, 20 November 2018

जेल जर्नलिज्म, कंटेंट का बाप


भड़ भड़ भड़, सुबह खिड़की पर तेज भड़भड़ाने की आवाज " उठो रे सब" , बगल वाले ने हड़बड़ा कर उठाया अमर को।घड़ी पर नजर पड़ी सुबह के पांच सबा पाँच बजे रहे थे । आंखे मलते हुए अमर ने देखा गिनती चालू थी ,ये क्या मसला है? बन्द करते है तो गिनते है, खोलते है तो गिनते है कहीं कम हो जाते हैं क्या? खैर पिंजड़े में जगह थी वरना मुर्गी समझ रहा था अमर खुद को, गिनती वाले गिनती कर चले गए। हिला कर उठाने वाले पड़ोसी ने कहा, भाई उठ जाया कर यहां तुरंत मरम्मत हो जाएगी। कल से ध्यान रखना " पिछवाड़ा पत्थर का हो तो कोई बात नहीं" । ये सरकारी भाषा थी शायद जो बोल रहा था वो "पिछवाड़ा पत्थर का" बुदबुदाया था अमर , ठीक है भाई उससे कहा। और फिर सो गया वो। अभी कुछ ही देर हुई होगी उसे सोये हुए की फिर भड़,भड़,भड़ " उठो रे भाई सब " प्रार्थना के लिये , ये आवाज हमारे मेट की थी। प्रार्थना भी होती है यहां , उन गंदे कंबलों से भी निकलने का इरादा नही हो रहा था उसका। ठंड बेकाबू हो रही थी।

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