खैर प्रोग्राम शुरू हुआ, एक घण्टा..दो घण्टा आगे जैसे जैसे समय बीता माहौल मे जादू सा छाने लगा। अचानक सबकुछ अच्छा लगने लगा, भागवताचार्य के मुख का तेज सभी को आकर्षित करने लगा। उनके मुँह से निकला एक एक शब्द लोगों को बांधने मे सफल प्रतीत हो रहा था। फिर
गोविन्द के गुण गाइये, गोपाल के गुण गाइये
द्वार कुंज के खोल कहिये, आइये प्रभु आइये
गाकर भागवताचार्य जी ने माहौल अपने पझ मे कर लिया। ये पहले ही दिन के चौथे घण्टे का कमाल था, कि सभी खड़े होकर झूम रहे थे। जो लोग अभी थोड़ी देर पहले तशरीफ रखते हुए गालियाँ बक रहे रहे थे, वो जयकारे लगा रहे थे। जाने क्या हुआ इन्हें और कितने दलबदलू टाइप थे सभी, पर प्रभु की माया तो प्रभु ही जाने। पहले दिन की भागवत समाप्ति की ओर चली। अन्त मे भागवताचार्य सभी श्रोताओ से मुखातिब होते हुए बोले..मेरे प्यारे भक्त गणों बड़ी मेहनत करके यहाँ भागवत की अनुमति मिली है....अगर आप लोगों को अच्छा न लगा हो तो बन्द किया जाए ये। तत्काल सभी हाथ जोड़ कर एक स्वर मे नहीं नहीं करने लगे।
दूसरा दिन 26 फरवरी, आज भागवताचार्य ने सभी से एक सवाल पूँछा। क्या किसी को पता है इन्सान कितने प्रकार का होता है, सभी ने इन्कार किया। बाद मे उन्होने कहा..चलो मै बताता हूँ इन्सान कि कितनी श्रेणियाँ होती हैं। धरती पर इन्सान सात श्रेणियों का होता है, सुनिये कौन कौन सी।
1. सबसे पहला वो जो अपना पेट हालता है या सिर्फ अपने लिये सोंचता है उसे..बुद्धिमान.. कहते हैं।
2. अपने के अलावा सोंचने वाला...सुबुद्धिमान... ।
3. सबके लिये सोंचने वाला...विधावान... ।
4. बिना पझपात, भेदभाव के पूरी दुनिया के लिए सोंचने या बाँटने वाला....प्रतिभावान... ।
5. जो सत्य के साथ चले....सत्यम्भरा...... ।
6. जो सत्य कभी न बदले......ऋतम्भरा..... ।
7. और आखिर मे अपने अहंकार व सबकुछ त्याग कर कण कण मे परमात्मा का अनुभव करने वाला....भागवत....कहलाता है। हे मेरे भक्तो भागवत मे कपट नहीं होता है, हम जैसे अन्दर हैं बाहर भी वैसा ही दिखना चाहिए। अजीब सा बदलाव देखने को मिल रहा था यहाँ के माहौल मे। भी तक जो घेर घार कर जबरन बिठाये जा रहे थे, वो अब पूरे अनुशासन के साथ अपने आप आकर बैठ रहे थे। बहुत कुछ अब सुखद लग रहा था अमर को भी।
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