इन सारी बातों के बीच अमर को एक और अहम जानकारी हासिल हुई थी, जेल मे दम तमाखु के आवागमन की जानकारी। ये भी एक खेल है, जो बेहद अहम और जरूरी होता है यहाँ जेल के लिए। पर हाँ इस खेल को खेलने वाला खिलाड़ी पारंगत होना चाहिए खेल मे। जेल से आने व खारजे मे बन्द होने के दौरान ही खेल हो जाता है। इस बीच जिसकी सेटिंग बनी उसे दूसरे कमरे मे ले जाकर चीज पकड़ा दी जाती है। बेहद कम समय मे बड़ा टास्क होता है। और ये सब करते हैं दिल्ली पुलिस के जाँबाज ,सिपेहसलार जो खुद को कानून का रखवाला कहते नहीं थकते हैं।
तारीख मे जेल से आने वाले इन 50 से 52 लोगों मे दो चार की संख्या मे कुछ चुनिंदा शूटर्स भी होते हैं। जो टी.एस.पी. की सघन तलाशी के बावजूद गाँधी (500 का नोट) या थान (1000 का नोट) निकाल ले जा पाते हैं। जेल के अन्दर इसी नाम से चलती है ये करेंसी। फिर कोर्ट से खारजे के बीच दिल्ली पुलिस वाली गारद की मद्द से नशे का सामान जुटाकर जेल ला पाते हैं। इन शूटरों द्वारा लाये गए गाँधी व थान की एवज मे दिल्ली पुलिस के ये जवान इन्हें चरस, गाँजा, तम्बाकू इत्यादी उपलब्ध कराते हैं। कुल मिलाकर जरिया है ये नशे के जखीरे का। कोई भी शूटर अपने साथ लाए गये गाँधी या थान इन्हें अलग ही स्टाईल मे दिखाकर चमकाता। चमका कर नोट फिर जेब मे डाल लेता। हैरत तो तब होती है जब इन्हें देखने वाली खाकी खुद चलकर इनके पास आती है और फिर शुरू होता है खुशफुसाहट का दौर।
हाँ बोल...पुलिस वाला अपने कड़क लहजे मे शूटर के पास जाकर। ..चचा गाँधी पड़ा है, शूटर कहता है।
क्या चाहिये...पुलिस वाला, तम्बाकू...शूटर बोला।
बिल्कुल दो टूक बातचीत, थोड़ी ना नुकर के बाद सिपाही गाँधी पकड़ लेता है। गाँधी लेकर सिपाही बाहर किसी दुकान से 5-5 रूपये वाले दो तम्बाकू के पाउच लाकर शूटर को पकड़ा देता है, लो हो गया काम। सारे दाग भी धुल गये और मम्मी को पता भी नहीं चला, है ना सुपर पुलिस। अब वो शूटर उस तम्बाकू को अपने साथ लाई गई पन्नी मे बाँधकर दो से तीन इंच के 4 – 5 कंचे बनाकर सटक लेता है। हैरत हुई थी अमर को देखकर की पाँच सौ के एक नोट मे 5-5 वाले दो तम्बाकु के पाउच, फायदा किसका हुआ। तो ये भी जान लीजिए की कोर्ट खारजे मे भले ही उस पुलिस वाले का हुआ हो, पर असल फायदा उसे होता है जो ये तम्बाकू सटक कर लाया होता है।
कोर्ट खारजे मे मिले गाँधी के वो पाँच कंचे जेल आकर पाँच गाँधियों मे तब्दील हो जाते हैं। इसके अलावा कभी कभी हाथ ऐसा पड़ जाए जब यहाँ माल की कमी हो तो गाँधियों की संख्या दस भी होने मे जेर नहीं लगती। दस रूपये की वो तम्बाकू जेल मे 5 हजार रूपये की बिकती है। और सोने के अण्डे देने वाली मुर्गी के समान हो जाता है इसे लाने वाला। जिस दिन जो शूटर तम्बाकू ले आता वो उस दिन का सी.एम. या उससे कम भी नहीं।
जेल जर्नलिज्म से साभार..............
No comments:
Post a Comment