Saturday, 24 November 2018

jail journalism, कंटेंट का बाप


अमूमन कोई भी तम्बाकू खाने वाला शख्स तम्बाकू खाने के बाद जितनी झाड़ दिया करता है, उतनी तम्बाकू भी यहाँ 50 रुपये की मिलती है। अमर को यहाँ हैरत होकर भी नहीं ही होती थी। दम यानी चरस जिसे यहाँ छींटा कहते हैं, अरहर के दाने से भी छोटा 50 रूपये का बिकता है। सटके गये कंचों को निकालने की कला भी बेहद अहम होती है। सबके बस का रोग नहीं है ये, इसे वही कर सकता है जो इसमे पारंगत हो। तम्बाकू लेकर जेल आने वाला शख्स दम भर पानी पीता, फिर उल्टी करता..उल्टी करने मे सारे कंचे खटाखट एक एक कर बाहर निकल जाते। जो फंसा रहता वो एक दो दिन मे नीचे के रास्ते बाहर निकल जाता। कितनी सारी फिल्मे थीं यहाँ।
शाम को खाना लेने का दृश्य भी बेहद दर्शनीय होता है यहाँ। बैरक का मेट लाईन लगवाकर खाना बाँटता है। दो दो बैरकों का खाना एक ही ढ़ोल मे आता है, तथा एक बैरक मे बन्दियों की संख्या करीब 30 के आस पास होती है। जेल मे बन्दियों के लिए बनने वाले खाने को खारजा कहते हैं, जो मुख्यता सभी लेते हैं..कुछ तथाकथित भाईयों को छोड़कर। बहन...चो.द.. तूने जादा ले ली, मादर...चो.द..तूने भी कहाँ कम ली। ये वो लोग थे जिन्हें जेल की भाषा मे कंगला कहते हैं, और इनसे उलझने मे जेल का बड़े से बड़ा भाई भी दिक्कत मानता है। आखिरी तक जरा भी सब्जी बचने पर मेट को भी खूब गालियाँ खाने सुनने को मिलती हैं, इन्ही कंगलों की तरफ से। साले बाकी क्या अपनी माँ की चू..त.. मे डालेगा क्या? ये वो लोग थे, जो पूरी भागवत सुनकर उसके भण्डारे का मजा गालियाँ देकर ही ले रहे थे। इसकी बहन की चू..त..भाई मजा आ गया हलुआ पूड़ी खाकर, भागवत से मिली शिझा गई भाड़ मे..इन्हें उससे क्या। ये शायद वो लोग होते हैं जिन्हें इनका पेट ही यहाँ खींचकर ले जाता है, इनके मुंह से खाना लेते या खाते समय भी गालियाँ बन्द नहीं होतीं। क्या लोग थे ये दीवाने, क्या लोग थे ये बलिदानी...खाने के नाम पर इनकी कुर्बानी वाली कसम ही सारी जद्दोजहद कराती है। अमर भी आखीर मे जो बचता चुपचाप लेकर खा लिया करता। जब कभी दाल सब्जी नहीं भी बचती तो कोई रहम दिल उसके बर्तन मे डाल दिया करता। प्रार्थना करता था अमर उस ऊपर वाले से कि हे दयानिधान तूने इन्सान बनाए ठीक पर पेट क्यों बनाया? फिर पेट के लिये खाना बना दिया, मारकाट के संसाधन भी उपलब्ध कराये। इसके बाद कुछ देव रुपी मानवों ने इजाद की गालियाँ, एक से बढ़कर एक..। कंटेंट देखिये तो बड़े से बड़ा लेखक रचयिता इन्हें इस्तेमाल करने वालों के हाथ जोड़ लें, नतमस्तक हो ले। जिधर देखो जहाँ सुनो, सुबह से शाम..साम से सुबह..सुबह से फिर रात तक बस गालियाँ ही गालियाँ। हर वैरायटी की आनलीआन बस गालियाँ। नमस्कार की मुद्रा मे था अमर भी इन गालियों के रचनाकारों के लिये। जेल जर्नलिज्म से साभार...........

No comments:

Post a Comment