एंबुलेंस हास्पीटल पहुँच चुकी थी, सभी को वहाँ एक खारजे मे बन्द कर दिया गया। अमर सहित वहाँ एक को और छोड़कर दो को दूसरे अस्पताल ले कर जाया गया। अब मेरे साथ खारजे मे वही एक बंदी था, जिसने अपनी शर्ट मे तम्बाकू की सीलें छुपा रखीं थीं। उसने पाँचों सीलें निकालीं, एक सील निगलने की कोशिश की पर उसके हलक से नीचे नहीं उतरी खांसी आने लगी उसे। फिर एकाएक उसने पैण्ट की जिप खोली, तथा सीलें पीछे के छेद से चढ़ाने लगा..पर सीलें नहीं चढ़ीं। सब कुछ देख रहा था अमर...और कह रहा था कि हे भगवान क्या क्या कर करवा रखा है, इन इन्सानो ने आपकी बनाई जगहों से। अब उसने एक सिपाही से पानी माँगा, उसने पानी लाकर दिया। पानी पी-पीकर वो पाँचों सील सटक दया। कैसा चमत्कार था ये, जो रामदेव भी नहीं कर सकता। ..भाई कैसे कर लिया ये चमत्कार तूने पहलवान..रहा न गया अमर से पूछ ही बैठा उससे। उसने भी बिना किसी झेंप या शर्म के छाती निकालकर कहा...जब इरादों मे हो जोश तो हर काम आसान हो जाता है। वाह री जिंदगी..और उस पर ऐसी किस्मे, धत तेरी की। कैसे कैसे ले जाते थे ये दम तम्बाकू, कोई सटक कर, कोई चढ़ाकर, उफ..सोंचकर ही उबकाई सी आ रही थी अमर को।
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