मनीष दुबे...... तो लो भाई लोग, ईंतजार की घड़िया खत्मै होन वाली हैं। क्योंकी एक नई तरह की और बेहद रोमांचकारी किताब जेल जर्लनिज्म की एडिटिंग लगभग लगभग पूरी हो चुकी है। उम्मीद है नए वर्ष मे ये आप सभी के हाथों मे होगी। बशर्ते ये 18 वर्ष से कम वालों के लिये बिल्कुल भी नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि कुछ अश्लीलता है दिलेर छोटे भी पढ़ना चाहें तो पढ़ सकते हैं। कुछ बहुत बेतरतीब गाली गलौंचें है, जो कंटेंट के अनुसार डाली गई हैं। इसमे आप वो सब पायेंगे जो अब से पहले आपने पढ़ा नही होगा। और यकीनन ये इसका अहम हिस्सा भी थीं। कुछ ऐसे की......
रहिमन गाली राखिये, बिन गाली सब सून
गाली गए ना ऊबरे, फर्जी मानुस चून।
और जेल मे गाली बिना सब अधूरा ही रहता है।
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