मुलाकातों पर वकील के सम्बन्ध मे ही बातें होती थीं, कितनी नीच श्रेणी के थे सभी। घरवालों पर भी गुस्सा आता पर तरस भी उससे जादा ही आता, कि कीड़ों, पिस्सुओं टाईप वकीलों का गुस्सा इन बेचारों पर क्यों निकालो। आखिर बाप ही थे उसके, और पैसे, रूपये, समय सभी कुछ बरबाद कर रहे थे। कितनी ही डर और थका देने वाली दौड़भाग कर रहे थे सिर्फ उसके ही खातिर परेशान हैं। ठीक उसी तरह जैसे आज वो अपनी बेयी के लिये परेशान था। कमाल ही थी बेटी भी उसकी, स्मार्टनेस के बाद एक्टिविटी भी बेहद प्यारी थी उसकी। छेना( रसगुल्ला) देखकर खुश हो जाया करती थी, कम ही खा पाती थी तब। दोनो हाथों को नमस्ते की मुद्रा मे जोड़कर सामने वाले से अपनी खुशी जाहिर करती। सामने के दो दाँत नीचे की तरफ अभी हल्के हल्के दिखाई देने शुरू ही हुए थे।
.......................जेल जर्नलिज्म से साभार
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