Sunday, 30 June 2019

मैने हैरान होना छोड़ दिया है


बड़ी हैरानी होती है काल के इस पखवाड़े में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले तथाकथित मीडिया की चपलता देखकर. सब तरफ व्यापारिक सांठगांठ, कमाऊ कंटेंट के बीच कहीं आमजन का दमन शोषण लुक छिप दब रहा है. पब्लिक है कि इसी को अपनी नियति मानकर निशब्द खामोश रह जाती है और मीडियाई सूरमा नई उपलब्धि जोड़ने में लगनशील. इससे भी बड़ी हैरानी तब होती है जब कही वो लिखा पढा देखता हूँ (जो मुझे ठीक ठीक याद नहीं) कि किसी अखबार में एक संपादक की वैकेंसी के लिए छपने वाले विज्ञापन में लिखा होता था..... "संपादक की आवश्यकता है" "मेहताना- चार सुखी रोटियां, एक लोटा पानी और संपादकीय लिखने पर दस वर्ष का कारावास" इसके विपरीत पत्रकारिता के जियाले लिखते थे. संपादक बनने के लिए कलेजा मजबूत रखते थे. अब यकीनन समय बदल गया है. सब सुख चाहते है. कोई न उड़ते तीर पकड़ना चाहता है और न पड़ी लकड़ी ही लेना चाहता है. दुनिया की ये सबसे बड़ी ताकत सत्ता का सामीप्य पाने के लिए रात दिन एक किये हुए लालायित लगती दिखती है. हालांकि सत्य कड़वा होता है पर फिलहाल है भी यही. हर घंटे, घंटे तो क्या मिनट में अपराध हो रहा है. फिर भी सबको फिक्र घण्टे की है. कोई फेसबुक में खबर भांज रहा है तो कोई माननीय से सेल्फिया रहा है. गाड़ी में ख़बरबाज लिखवा लिया, एक कार्ड मिल बन गया, और मुंह मे लगाने वाला डंडा (माइक). पइसा मिले न मिले कोई फर्क नहीं छाती नरेंद्र मोदी वाली बताई गई से ज्यादा ही रहती है. सच पूछो तो इन्ही की वजह से अब फॉलोअप नाम की प्रथा का अंत हो गया, तथा सही व मुख्यधारा के न्यूजमैन बदनाम. हर दिन नए की होड मची पड़ रही है सबको जल्दी है मालिक का व्यापार और खुद को बढ़ाने की. रो रहे थे उस दिन फोन पे सभी वो विलासपुरिये लेबर जब उन्हें एक अज्ञात दीवान उठाकर चौकी ले गया था. गलती इतनी थी कि बेचारे अपने मालिक के आदेश पर घरेलू गैस से बेल्डिंग कर रहे थे. चौकी इंचार्ज साहब ने उन्हें छोड़ने की एवज में एक लाख रुपए की डिमांड की. सौदा बाद में 25000 में पटा. उक्त 25 हजार की रकम चौकी में भरकर सभी लेबर अपने घर आ पाई. इस दफा तीसरी बार हैरानी हुई कि उक्त बात मैने शोशल मीडिया में डाली अपने ब्लॉग में चस्पा किया, इतना ही नही कई नामी और मझोले अखबारों के अलावा बड़े इलेक्ट्रोनिक मीडिया हाउसों के प्रतिनिधियों को भी जानकारी दी कि आओ पैसे देते हुए खिंचवाता हूं. फोन सबने उठाया बाकायदा राम रहीम भी हुई, फिर मामला सुनने के बाद किसी ने ना फोन उठाया और कई तो बिजी वाला सिस्टम लगाकर मेरी नजरों में बेपर्दा हो लिए. जिसको लूटना था वो लूट गए और जिसको लूटना था वो लूट ले गए, यू पी की दो छत्रप पार्टियों के किसी नेता पर किया गया एक व्यंग याद आता है कि " हम जाए तो तुम लूट लेना तुम गए तो हम तो हैं ही" हीहीही हंसी आती है समाज का पहरुआ सिस्टम भी तो इसी नीति को फॉलो करता है. तो फिर काहे का बचा खबरनवीस, और काहे का उसका जनता से जुड़ा सरोकार. तुम ना पानी की किल्लत दिखाओगे और ना गोद मे बच्चा लिए लेबरी करती हुई महिला को. तुम दिखाओगे तो सिर्फ ट्यूबर्ग या कैडबरी का एड और चमकती हसीनाएं और चिकने लौंडे व्यापार का भी दबाव है ना. दिखाते रहो अपने घण्टे से पर इतना तो तय है कि अब आज अभी से मैने भी हैरान होना छोड़ दिया है.

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