29 नवम्बर 2005 जिला ग़ाज़ीपुर. आपराधिक प्रवत्ति वाले जघन्य अपराधियों ने तत्कालीन भाजपा विधायक कृष्णानंद राय की स्वचालित हथियारों से ताबड़तोड़ गोलियां चलाकर हत्या कर दी थी. मामला बड़ा था तथा घटना से समूचा यू पी हिल चुका था. हत्या करने वाले भी कद्दावर थे और जिसकी हत्या हुई वो भी कम नहीं था.
हत्या हुई सभी को पता था किसने की और किससे करवाई ये भी सब जानते थे. फिर कार्यशैली में छेद किसकी कहना कठिन है क्योंकि सभी आरोपी सबूतों के अभाव में बाइज्जत बरी हो चुके हैं.
मुख्य आरोपी 5 बार के विधायक मुख्तार व पूर्व सांसद अफजाल उत्तर प्रदेश की बसपा पार्टी के बेहद करीबी थे. फिलहाल अब दोनों निर्दलीय होकर पार्टी से दूर है. इस मामले को राजनैतिक दृष्टिकोण से भी देखा जाना चाहिए कि भाजपा के केंद्र शासन वाली सरकार राज में सीबीआई की नरमी कल को अंसारी बन्धुओ को मायावती के खिलाफ भी इस्तेमाल कर सकती है.
इसी तरह सरकार सुनील राठी को भी रियायत दे सकती है जिसने 9 जुलाई 2018 को बागपत जेल में विधायक के हत्यारोपी मुन्ना बजरंगी को जेल के अंदर गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया था. किसको पता कि खाने के टिफिन में सुनील के लिए अंदर पिस्तौल पहुँचाई गई थी. और क्या फायदा जेल के भीतर पिस्तौल पहुंचाकर इस सुनियोजित हत्या को अंजाम दिलवाने के बदले चार जेल पुलिस कर्मियों को सस्पेंड करके क्योकि कल सुबूतों के अभाव में सुनील राठी को भी बरी हो जाना है. आखिर अब राठी का भी सिक्का चल निकला है तो कौन गवाही देगा. फिर इतना लंबा मुकदमा चलाने खींचने का भला क्या लाभ.
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