Sunday, 11 August 2019

चीन मतलब सफेद छोटी दाढ़ी- मनीष सिंह


अक्साई चिन। चीन नही, चिन.. मतलब छोटी सफेद नदी।। लद्दाख के पूर्व में ठण्डा रेगिस्तान, "जिस पर घास का तिनका नहीं उगता" - ऐसा दुष्ट नेहरू ने संसद में कहा था। और ऐसा कहकर वो इलाका चीन को गिफ्ट कर दिया था। हैं न? जी नही। आपकी अपनी सोच का अश्वमेध घोड़ा, इतिहास के सारे काल मे दौड़ दौड़ कर जितने इलाके कवर कर लेता है आप उसे जोड़ते जाते हैं। कल्पना में एक साम्राज्य बना लेते है। मुगल से नफरत है, मगर उनका जीता हुआ अफगानिस्तान अखंड भारत के काल्पनिक नक़्शे में शामिल है। अंग्रेजी राज से किसी को प्यार नहीं, मगर अंग्रेजो ने तिब्बत, म्यानमार को जीता था, इसलिए टपकती लार के साहित्य में वो भी अखण्ड भारत के हिस्से हैं। कह दीजिये की कल्चर हमारे समान है, इसलिए वो भी हिंदुस्तान है। मगर अफगान, अरुणाचल, और लद्दाख के कल्चर कौन सी समानता है जनाब? अजी, सब खामखयाली और आपको बरगलाने के व्याख्यान है। क्योंकि ये हिस्ट्री आपको पता नही है। हमारी हिस्ट्री का पाठ 1947 में आकर खत्म हो जाता है। इसके आगे का ज्ञान व्हाट्सप पर मिलता है। मानिए, या न मानिये। आज का राजनैतिक हिंदुस्तान 15 अगस्त 1947 से शुरू होता है। ज़्यादातर इलाके ब्रिटेन के सीधे शासन में थे, वे हिंदुस्तान पाकिस्तान में बांट दिए गए। राजाओ को ब्रिटिश रानी की मैत्री सन्धि से मुक्त कर दिया गया और अपना फैसला खुद करने की आजादी दी गई। ऐसे में कोई राजा अपने उसी इलाके का ऐक्सेशन कर सकता था, जो उसके पास हो। जो हिस्सा राजा के पास नही था, उसके अनेक्स न होने का दोष, नियमतः नेहरू का होता है। गिलगित बाल्टिस्तान, एक्सेशन के पहले कश्मीर राजा से अलग हो चुका था। इसलिये नेहरू दोषी हैं। अक्साई चिन के लिए भी नेहरू ऐसे ही दोषी है। अक्साई चिन लद्दाख और तिब्बत के बीच का हिस्सा था जिस पर कश्मीर राजा और चीन राजा दोनों का दावा था। दावा सिर्फ दादागिरी के लिए था, असल मे इस सूखे रेगिस्तान की परवाह दोनो को न थी। कोई सीमा स्पस्ट नही थी। न कोई गश्त होती, न किलेबन्दी..। मगर देश पर राज कर रहे अंग्रेज, फितूरी थे। एकदम चाक चौबन्द। भई, सीमा वीमा तो स्पस्ट रहनी चाहिए। इनके सर्वेयर दल गया, एक नक्शा बनाया, सीमाएं बनाई। अपने अफसरों को भेजी। एक कॉपी चीन राजा को अप्रूवल/आपत्ति के लिए भी भेजा। चीन राजा अपने मैनलैंड के लफड़ों में बिजी थे। कभी न आपत्ति भेजी न अप्रूवल। ये अठारहवीं सदी की बात है। वक्त बदला। कश्मीर राजा अनेक्स हुए। अंग्रेजो का दिया जो नक्शा था, उसे ही हमने भारत बताकर छाप दिया। हिंदुस्तान की जनता की निग़ाहों में वो बस गया। अभी भी बसा है। वक्त तो चीन में भी बदला था। बन्दूक की नली से सत्ता निकाल कर माओ चीन के हृदय सम्राट हो चुके थे। पब्लिक को ठंडा रखने के लिए दुश्मन चाहिए था। दुश्मन मिला, जिनजियांग में, उइगर मुसलमान। वो ऑटोनोमस लोग थे, चीन से स्वतंत्र इतिहास था। अलग होना चाहते थे। चीन ने एक रोड बनाई, तिब्बत से जिनजियांग, ताकि उसकी सेनाएं जा सकें। वो रोड अक्साई चिन से गुजरती थी। नेहरू जी ने आपत्ति की। नक़्शे दिखाए। माओ बोले- " जाओ, पहले इस नक्शे पर हमारे तत्तकालीन राजा का साइन लेकर आओ। तब मेरे भाई, जित्ता एरिया बोलेगे, छोड़ दूंगा" नही। ऐसा दीवार फ़िल्म में होता है, बॉर्डर पर नही। बॉर्डर विवाद चालू हो गया। चीन ने अपनी रोड की सुरक्षा में सेना लगा दी। हमने भी लगा दी। उनके आदमी आते, चट्टानों पर चीन लिखकर चले जाते है। हमारे आदमी जाते, मिटाकर इंडिया लिख आते। एक बार लड़ भी लिए हम, हार गए। तब से सारा जोर पाकिस्तान पे दिखाते हैं। उसपे भी न चले तो कश्मीरियों पर दिखाते है। ये इसपर डिपेंड करता है कि पीएम कित्ता बरियार है। अक्साई चिन में जो जहां बैठा था, वहीं बैठ गया। लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल कहते हैं उसको। घास का तिनका वहाँ अब भी नहीं उगता, छोरियां भी नही है। मगर प्लाट मिल सकते है। एनिबॉडी इंटरेस्टेड? पत्रकार मनीष सिंह की fb वॉल से साभार

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