Sunday, 18 August 2019

एक बाप ने बेटे को दिखाई सच्ची मित्रता


एक बेटे को अपने हमप्याला दोस्तों पर बड़ा गुरूर था। दिन रात उनके साथ आवारा घूमकर वक्त बरबाद करता था... पिता जब भी उसे आवारा दोस्तों से दूर रहने को कहते तो वो नाराज हो जाता कि उसके दोस्त हमेशा उसके लिए जान तक देने को तैयार रहते हैं। इसके उलट..पिता का एक ही दोस्त था, लेकिन सच्चा। बचपन से उसके सुख दुख में साथ, लेकिन दोनों एक दूसरे की जिंदगी में दखल नहीं देते थे। हां तो एक दिन पिता ने बेटे से कहा कि तेरे बहुत सारे दोस्त हैं.. उनमें से आज रात तेरे सबसे अच्छे दोस्त की परीक्षा लेते हैं। बेटा तैयार हो गया। रात को तीन बजे दोनों बेटे के सबसे घनिष्ठ मित्र के घर पहुंचे। बेटे ने दरवाजा खटखटाया, लेकिन दरवाजा नहीं खुला। बार-बार दरवाजा ठोकने के बाद अंदर से दोस्त की आवाज आई। वो अपनी मां से कह रहा था कि कह दे मैं घर पर नहीं हूं।यह सुनकर बेटा उदास हो गया, अतः निराश होकर दोनों लौट आए। फिर पिता ने कहा कि बेटे आज मैं तुझे मेरे दोस्त से मिलवाऊंगा। दोनों पिता के दोस्त के घर पहुंचे। पिता ने अपने मित्र को आवाज लगाई। उधर से जवाब आया कि ठहरना मित्र, दो मिनट में दरवाजा खोलता हूं। जब दरवाजा खुला तो पिता के दोस्त के एक हाथ में रुपये की थैली और दूसरे हाथ में डंडा। पिता ने पूछा, यह क्या है मित्र। तब मित्र बोला....अगर मेरे मित्र ने इतनी रात को मेरा दरवाजा खटखटाया है, तो जरूर वह मुसीबत में होगा और अक्सर मुसीबत दो प्रकार की होती हैं..या तो रुपये पैसे की..या फिर किसी से विवाद हो गया हो। अगर तुम्हें रुपये की आवश्यकता हो तो ये रुपये की थैली ले जाओ और किसी से झगड़ा हो गया हो तो ये लट्ठ लेकर मैं तुम्हारें साथ चलता हूं। पिता की आंखें भर आई और उन्होंने अपने मित्र से कहा कि, मित्र मुझे किसी चीज की जरूरत नहीं, मैं तो बस मेरे बेटे को मित्रता की परिभाषा समझ रहा था। बेटा सच्ची दोस्ती का अर्थ जान चुका था... मनु मनस्वी की फेसबुक वॉल से साभार

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