Wednesday, 29 June 2022
इस एंकर को मोदी की चापलूसी के लिए पद्मश्री मिलना चाहिए
टाइम्स नाऊ नवभारत का कार्यक्रम न्यूज़ की पाठशाला. इस स्लॉट को एंकर सुशांत सिन्हा होस्ट करते हैं. मुझे याद नहीं जो कभी इस एंकर कम पाठशाला के मास्टर नुमा सुशांत को अच्छी पत्रकारिता करते देखा हो. ढाई महीने से टीवी नहीं देखी लेकिन इन दिनों सिटी नेटवर्क कनेक्शन में टीवी खोलते ही सबसे पहले यही चैनल हिनहिनाता हुआ सामने आता है. पाठशाला में सुशांत मोदी के सप्पोर्ट में घोड़े दौड़ा रहे थे. उदयपुर की घटना के लिए पापा को दोष न दिया जाए इसलिए यह ऑडियंस को 93 साल पहले लाहौर (अब पाकिस्तान) तक ले गया.
एंकर ने उदयपुर में टेलर की हत्या पर बोलना शुरू किया. उनने कहा, लोग कहते हैं यह सब 2014 के बाद होना शुरु हुआ है. एंकर ने कहा 'तो भैया यह 2014 से पहले भी होता रहा है. इसके बाद एंकर 1929 में चला जाता है, जब देश गुलाम था. दंगे 1929 से अब यानी 2022 तक हो रहे हैं. एंकर ने अपनी इनवेस्टिगेटिव आंखों से उस समय देखकर बताते हुए कहा कि तब एक किताब के पब्लिशर राजपाल मल्होत्रा की 6 अप्रैल 1929 को लाहौर में गला काटकर हत्या की गई थी. लाहौर अब पाकिस्तान में है. तब मोदी प्रधानमंत्री नहीं थे. इसके बाद एंकर ने और भी दंगे गिनवाए. लेकिन उसने 2002 दंगों का जिक्र नहीं किया. क्या गुजरात मे जो कुछ हुआ उसे दंगे की श्रेणी में नहीं गिना जाएगा?
मोदी के साथ साथ एंकर अपनी जमात का भी बचाव करते हुए कहता है, 'हत्या के लिए इस सोच को जिम्मेदार ठहराने की जगह, कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है, कभी मीडिया को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है, कभी ये कहा जाता है कि राजनीति जिम्मेदार है. अक्सर ये कह दिया जाता कि 2014 में मोदी के पीएम बनने के बाद देश का माहौल बिगड़ गया. जो सोच आज की नहीं है, जो सोच वर्षों से चली आ रही है, जो सोच 2014 के बाद नहीं आई, जो सोच 2014 के पहले भी रही है, जब नरेंद्र मोदी पीएम नहीं थे, और तब भी थी, जब देश आजाद नहीं हुआ था.'
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