Tuesday, 23 July 2013

बिहार में 'डर्टी पॉलिटिक्‍स' तेज, लालू जदयू तो नीतीश भाजपा को तोड़ने में लगे?


NEWS DESK पटना. at news war media - बिहार में भाजपा-जदयू गठबंधन टूटने के बाद अब पार्टियों के टूटने का खतरा बढ़ गया है। न केवल भाजपा, बलिक जदयू में भी टूट का खतरा है। सत्‍ताधारी जदयू के एक मंत्री ने कहा है कि 42 भाजपाई विधायक उनके संपर्क में हैं। वहीं ऐसी भी खबर आ रही है कि लालू प्रसाद यादव भी जदयू में सेंध लगा कर राजद का कुनबा मजबूत करने की जुगत में जुट गए हैं। पार्टियों को तेाडऩे में लालू प्रसाद की राह चले नीतीश कुमार? सत्ता में रहते लालू प्रसाद ने किसी भी दल को छोड़ा नहीं था। सभी टूट गये थे। भाजपा से लेकर भाकपा माले तक। क्या वही कहानी फिर दोहरायी जाएगी? यह सवाल इसलिए मौजूं हो गया है कि भाजपा और जदयू के बीच एक-दूसरे के विधायकों को अपने पाले में करने का खेल खेला जा रहा है। आइए देखते हैं पार्टियों को तोडऩे में लालू प्रसाद और नीतीश कुमार के बीच कैसी हैं समानताएं। भाजपा को तोड़ चुके हैं लालू 1990-91 में लालू प्रसाद ने भाजपा को जोर का झटका दिया था। तब भाजपा राष्ट्रीय मोर्चा से केंद्रीय स्तर पर अलग हो गयी थी। इस लिहाज से वह बिहार विधानसभा में विपक्ष में थी। उस समय मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस थी। लालू प्रसाद ने इंदर सिंह नामधारी और समरेश सिंह सहित एक दर्जन विधायकों को भाजपा से तोड़कर अपने पाले में कर लिया था। भाजपा से अलग हुए विधायकों ने मिलर स्कूल में पार्टी का स्थापना सम्मेलन किया था और नयी पार्टी बना ली थी। संपूर्ण क्रांति दल का थोड़े दिनों बाद ही जनता दल में विलय हो गया था। उसके बाद संपूर्ण क्रांतिकारी दल के कई विधायकों को मंत्री बनाया गया था। भाकपा से लेकर माले तक में की थी सेंधमारी भाकपा और भाकपा माले जैसे कैडर आधारित पार्टियों को भी लालू प्रसाद ने तोड़ा था। भाकपा से अलग होकर कुछ विधायकों ने साम्यवादी क्रांतिकारी दल बनाया था। उसके बाद संपूर्ण क्रांति दल के तर्ज पर भाकपा से अलग हुए विधायकों ने नवगठित पार्टी का विलय जनता दल में कर लिया था। उनमें से कुछ को मंत्री बनाया गया था। इसी प्रकार 1990 में पहली बार विधानसभा में पहुंचे माले के सात में से चार विधायकों को अपने पाले में कर लिया था। विधायकों की संख्या के लिहाज से छोटी हैसियत वाली समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के विधायकों को लालू अपने साथ जोड़ते रहे। भाजपा को तोडऩे की पटकथा नीतीश लिखेंगे? तब नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद के साथ रहकर भाजपा को तोड़ा था। तब लालू प्रसाद मुख्यमंत्री थे। अब नीतीश कुमार उस भूमिका में हैं। नीतीश कैबिनेट में महत्वपूर्ण कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह अगर भाजपा के 42 विधायकों के संपर्क में रहने की बात कहते हैं, तो चौकस होना लाजिमी है। जाहिर है कि भाजपा के कई विधायकों पर डोरे डाले जा रहे हैं। हालांकि भाजपा से संबंध तोडऩे के पहले से ही उसके कई विधायकों के साथ जदयू ने अपने संपर्कों को तेज कर दिया था। संयोग रहा कि लालू प्रसाद जब मुख्यमंत्री बने तब भाजपा उनके साथ थी। बाद में वह अलग हुई। नीतीश कुमार के साथ भाजपा उनकी कैबिनेट में थी। बाद में नीतीश ने उसे अलग कर दिया। अब सेंधमारी का खतरा है। लोजपा को तोड़ा, कांग्रेस का लिया साथ 2010 में 115 विधायकों वाले जदयू ने लोजपा के चार में से तीन विधायकों को तोड़कर अपने पाले में कर लिया। उसके राज्यसभा सदस्य साबिर अली तो भी तोड़कर अपने साथ जोड़ लिया। उन्हें अपने पाले में करने के पहले साबिर अली को नीतीश कुमार न राज्यसभा से इस्तीफा दिलवाया और बाद में जदयू की ओर से उच्च सदन में भेजा। कांग्रेस के चार विधायकों में से सभी नीतीश कुमार के संपर्क में बताये जाते हैं। भाजपा से अलग होने के बाद विधानसभा में विश्वास मत हासिल करने के दौरान कांग्रेस ने उनका समर्थन किया था। भाकपा के एक विधायक भी नीतीश के समर्थन में थे। लालू की तरह विरोधियों के खिलाफ मनोवैज्ञानिक दबाव बना रहे नीतीश नीतीश कुमार राजनीति में अपने बड़े भाई लालू प्रसाद की तरह विरोधियों पर दबाव बनाने के लिए मनोवैज्ञानिक दबाव बन रहे हैं। भाजपा में कलह की मौजूदा तस्वीर के पीछे की कहानी ऐसी ही है। हालांकि दल बदल कानून के तहत 91 विधायकों की वाली भाजपा को तोडऩा आसान नहीं होगा। उसे तोडऩे के लिए मौजूदा कानून के अनुसार 60 से अधिक विधायकों की जरूरत पड़ेगी। राजनीतिक हलकों में चर्चा के अनुसार राजद के 22 विधायकों को तोडऩा नीतीश कुमार के लिए इसलिए मुश्किल हो गया था कि दो तिहाई विधायकों का जुगाड़ नहीं हो पा रहा था। राजद विधायकों को तोडऩे के लिए 15 विधायकों की जरूरत पड़ रही थी और इतने विधायक नहीं जुट पा रहे थे।

No comments:

Post a Comment