देखिये दीया रविवार को जलाना है। रात को नौ बजे। ज्यादातर घरों में अब दीया नहीं होगा। कुछ एक घरों में होगा भी तो महंगाई के ज़माने में तेल का संकट है। कुछ घर तेल के खेल से बेअसर भी हो सकते हैं। लेकिन संपूर्ण बंदी के वक्त दीया जलाने के लिए तेल का जुगाड़ करना चुनौती है। जरूरी बंदोबस्त के जरिए तेल का जुगाड़ भी कर लें तो अब उस दीये को वो मोदी जी के कहने पर रात 9 बजे जलाएंगे या संझा-पराती के वक्त जलाकर भगवान को खुश करेंगे। जो घर में कोरंटाइन हो रहे भक्त की पीड़ा हरेंगे। हो सकता है मौत बनकर नाच रहे कोरोना के काल को भी टाल दें। इन सबका गुणा-गणित पार करने के बाद दीया रविवार को रात को नौ बजे चंद लोग ही जलाएंगे। रही बात मोमबत्ती की तो दीया के मुकाबले मोमबत्ती जलाना थोड़ा आसान है। लेकिन फिर वही सवाल ? बिजली, इनवर्टर सोलर लाइट और जेनरेटर के जमाने में मोमबत्ती कौन खरीदता होगा। कुछ एक लोग जरूर खरीदते होंगे। भारत में गरीबी, पिछड़ापन, गांव और गंवार बहुत हैं। लेकिन वह भी पूजा पद्धति को आधुनिक रूप देने के लिए दीया की जगह मोमबत्ती का इस्तेमाल करते होंगे। उनके सामने भी वही सवाल होगा कि मोमबत्ती भगवान के लिए जलाएं या मोदी जी के आह्वान पर। ऊपर से उनके मन में भी विचार आएगा कि लाॅकडाउन के वक्त मोमबत्ती जला दे तो बाद में क्या होगा। मोमबत्ती मोटी हुई तब तो ठीक है। लेकिन पतली हुई तो नौ मिनट में पूरी जल जाएगी। इन तमाम उधेड़बुन को पार करने के बाद इक्का-दुक्का लोग ही मोमबत्ती जलाने का जोखिम उठाएंगे। रही बात टाॅर्च और मोबाइल की लाइट जलाने की तो। जलाने वाले ज्यादातर लोग यही जलाएंगे। इन दोनों जलने वाली वस्तुओं में तपिश बिल्कुल नहीं होती। तपिश सिर्फ दीया और मोमबत्ती की रोशनी में होती है। वह भी बहुत सीमित मात्रा में। जिससे थोड़ी सी भी दूरी उसके तपिश से दूर रखती है। ज्यादा डर हो तो दूरी और बढ़ाई जा सकती है। जलन बिल्कुल नहीं होगी। लेकिन उसकी रोशनी दूर-दूर तक होगी। रोशनी त्याग, समर्पण, बलिदान और इमानदारी की। जिससे सब रौशन होंगे। रविवार रात को नौ बजे इस रोशनी के रौशन होने से पहले इसकी तपिश में जल-भुनकर राख होना समझ से परे है! 🙏
राजकुमार सिंह की एफबी वॉल से साभार
No comments:
Post a Comment