Sunday, 19 April 2020

मुम्बई में पालघर में साधुओं की लीचिंग के मायने


पालघर की दर्दनाक घटना ने एक बार फिर से डरा कर रख दिया है. इस अक्षम्य घटना ने फिर से अतीत में देखने को मजबूर कर दिया है. हम निंदा स्वरूप इतना तो कर ही सकते हैं. हम में से अक्सर लोग महात्मा गाँधी से अपनी असहमति को गोडसे के समर्थन में बदल देते हैं. इस तरह हम सब उस ह्त्या में शामिल हो जाते हैं और हमें लगता है कि हम ह्त्यारे नहीं हैं. मुझे याद है, जब 84 में सिख विरोधी दंगा हुआ था तब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने "एक बड़े पेड़ के गिरने से घरती के हिलने" की बात कह कर दंगाईयों को वैधता प्रदान की थी. जिसका आर एस एस के नानाजी देशमुख ने समर्थन किया था और अपने लोगों से आह्वान किया था कि कांग्रेस का हाथ मज़बूत करें. इस आह्वान के बाद कांग्रेस को लोकसभा में जितनी सीटें आईं वह आज तक एक इतिहास है. इस तरह सिखों की हत्या में अथवा मॉब लिंचिंग में वह पूरा समाज शामिल हुआ जिसने कांग्रेस को वोट दिया. मैं ज़िम्मेदार पदों पर बैठे हुए लोगों द्वारा करवाई गई मॉब लिंचिंग/ दंगे की बात कर रहा हूँ. क्योंकि आम लोगों पर उन्हीं का असर पड़ता है या उनसे ही उन्हें शह (ताकत) मिलती है. 2002 में गोधरा ट्रेन में ब्लास्ट होता है जिसके बाद व्यापक पैमाने पर गुजरात में दंगे होते हैं, लोकसभा सांसद अहसान जाफ़री की मॉब लिंचिंग होती और तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी उसे "लोगों का गुस्सा निकला" कह कर उस दंगे को वैधता प्रदान करते हैं. उसके बाद भाजपा ने जो इतिहास बनाया वह अब अतीत नहीं है हमारा वर्तमान है. लोग बदला लेने और ह्त्या करने को इंसाफ़ मानने लगे. क्योंकि लोग अपने मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री से प्यार करते हैं. इसलिए उसका हर शब्द, पत्थर की लकीर होता है. हर व्यवहार अनुकरणीय होता है.मॉब लिंचिंग करने वालों को फूल मालाएँ पहनाई गईं. दंगे के आरोपियों को मंत्रीपद दिया गया. आतंकवाद की आरोपी को संसद में जगह दी गई. ये सब उन दंगों, मॉब लिंचिंग, ब्लास्ट को वैधता प्रदान करना था. इस तरह उन तमाम दंगों, मॉब लिंचिंग और ब्लास्ट में हम शामिल हो गए. इस तरह पाँच दिन पहले हमने संतों की भी हत्या कर दी/ करवा दी. अब हम उसमें कोई सांप्रदायिक कोण भी खोजने लगे. बहरहाल, अब महाराष्ट्र सरकार पर मेरी नज़र है कि कहीं आरोपियों को फूलमाला न पहना दे या मंत्रीपद न दे दे या विधानसभा में कोई सीट न दे दे. अगर अभी भी ऐसा ही हुआ तो हम सबको अपनी अपनी बारी का इंतज़ार करना होगा. फरीद खां की एफ बी वॉल से साभार

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